Friday, 30 August 2013

चिंदी चिंदी सुख -----



चिंदी चिंदी सुख
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चिंदी चिंदी सुख हैं

थान बराबर दुःख हैं

चलो टुकड़ों में फाड़ते है

दुःख के इस थान को

बीच बीच में सुख की

चिंदिया लगा कर

पैबन्दो वाली चादर सिलें

पत्थरों के बिस्तर की

सलवटें हम दोनों ही

अपने हाथों से मिटायें

और फिर यही चादर ओढ़ कर

चलो उस पत्थर लेट जाएँ

हम दोनों ------

मै च्युंगम चबाऊंगीं

तुम सिगरेट सुलगा लेना

उसके धुंये में उड़ा देना

सारे गम गिले शिकवे

लेकिन बस आज ही

तुम्हे पता है न ----

मै हमेशा ही कहती हूँ

सिगरेट मत पिया करो

पर तुम न सुनते ही कहाँ हो

अच्छा बस उँगलियों में ही

फंसा कर रखो न अब

जरा स्मार्ट से लगते हो जी

और मै अपनी सारी खीझ

च्युंगम चबा चबा कर ही

निकाल दूंगी -------  :)

-----Divya Shukla-------

30- 8-2013

पेंटिग गूगल से

Monday, 26 August 2013

तो शब्दों के समूह पंक्तिबद्ध न होते




तुम न होते तो शायेद ---
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पूर्णमासी का पूर्ण चन्द्र हो

तो कभी कृष्ण पक्ष का खंडित

पीड़ा से पीला पड़ा चाँद भी तुम

--हाँ तुम ही तो हो ----

प्रसन्नता में हो अगर

तो झलक जाते वेदना में भी

तुम न होते तो शायेद ये

शब्दों के समूह पंक्तिबद्ध हो

कविता का रूप न धरते

कभी जीवन के संगीत में

तो कभी अचानक

झटके से मिले विरामों में

तो कभी खाली पसरी सडक

के दूर तक फैले सन्नाटे में

बाहें पसारे नजर आते हो

सुबह मंदिर से आते श्लोकों

की गूंज में पवित्र घंटियों में

तो दोपहर के कर्कश कोलाहल में भी

डूबते सूरज की लालिमा में

क्रोध से रक्ताभ चेहरा

लिए दीखते हो तुम ---

शाम ढलते ढलते चाँद की

शीतल धवल ठंडक बन

अंतर्मन में उतर आते हो

या मेरा मन ही दर्पण सा है

जो हर रूप में झलक जाते हो

-----Divya Shukla--------

26-8-2013


चित्र गूगल से साभार 

Saturday, 24 August 2013

पुराने संदूख से मिला खत !!

पुराने  संदूख से मिला खत !!
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पुराने कागजो मिली आज ----------

----------बरसों पहले मुझे ससुराल में

लिखी माँ की पहली चिट्ठी ------------

---------कितनी नसीहतें है इसमें

कुछ प्यार भरी धमकी भी ------------

------------ठीक से रहना ससुराल है तेरा

जोर से मत हंसना -धम धम कर के भाग दौड़ न करना

पता नहीं तुझे कब अक्ल आएगी समझती ही नहीं

हे भगवान ये पागल गुड़िया भी छुपा कर ले गई अपनी

अच्छा सुन उसे निकाल कर खेलना मत बेटा

वरना सब तेरे पापा और माँ को कहेंगे --------

कुछ सहूर ही नहीं सिखाया इसकी माँ ने ------

कोई शिकायत न आये वहाँ से समझी ?

रोज सुबह उठ कर सब बड़ों के पैर जरुर छूना

भूलना मत सबके पैर छूना समझ रही है न ?

तुझे समझया था -- मुझे याद आया माँ ने

विदा के समय बड़े धीमे से कान में कहा था कुछ

फिर मुझे हंसी आ गई ----वो सब याद करके

जब मैने तिनक के कहा था क्या इस लड़के के भी

न नहीं बिलकुल नहीं छूना मुझे नहीं करुँगी जाओ

माँ का चेहरा पीला पड़ गया न जाने यह क्या करेगी

कोई अक्ल सहूर भी नहीं इसे मना किया था

मत करो इसकी शादी अभी से -----

हाथ में कांपता हुआ माँ की चिट्ठी का

ये पीला जर्जर कागज़ लग रहा है

मानो मेरी बीमार माँ का कमजोर चेहरा हो

वो आज भी पीला पड़ जाता है मेरी चिंता में

चिट्ठी के पीले पड़े कागज़ में दो बूंद आंसूओं के निशान हैं

उन्हें छुआ वो अभी भी नम है -----

बस दो बूंद ढलक गई मेरी आँखों से --

बुदबुदा उठी ओंठो में इक हूक सी उठी कलेज़े में

माँ इस बार जल्दी आउंगी मै -तुम्हारी गोद में सर कर

रोना है मुझे -- ढेर सारी बातें करनी है

और वह गुड़िया उसकी सीवन उधड़ गई है

फिर भी सहेज़ रखा है तुमने बनाई थी न

इस बार आउंगी उसे फिर से सी देना

तुम सी दोगी न माँ --मै फिर से जी लुंगी

अपना अधूरा छूटा बचपन ----- !!

-----------Divya Shukla------------
24-8-2013

पेंटिंग गूगल स

Wednesday, 21 August 2013

कब तक लोगे सात फेरों के गुनाह का बदला ? ---

कब तक लोगे सात फेरों के  गुनाह का  बदला ? --
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मिस्र के पिरामिड में हीरे जवाहरात के बीच ममी सुरक्षित तो रहती है युगों तक 
.. पर खुश नहीं रहती --- खुश रहने के लिए एक पल काफी है .....प्रेम का पल .....वरना ईंट पत्थर के पिरामिड में ---- भटकती है एक जिन्दा रूह --- जो सोने और पीतल को मिला कर उनमे अंतर देखती कभी हीरे और कांच में अंतर खोजती फिर यह सोचती दोनों एक से ही हैं इनमे सुख कहाँ ---- झूठे बोलों में प्रेम का भ्रम पालती ---कभी नियति का खेल मान मन मार लेती ------अक्सर हवेली की तीसरी मंजिल पर शाम को ढलता सूरज देखती ---रात के सन्नाटे में अहीर टोले से गूंजते गीत सुनती जिन्हें वो लोग देसी महुआ के मद में मस्त हो छांग बजा कर गाते ----भोर के तारे से बतियाती फिर खीज उठती --उसे याद आता फिल्म का डायलाग --जेवर बनवाओ फिर जेवर तुडवाओ ---तुम औरतो को यही करना चाहिये -- खुश रहो इसी में सज कर इंतजार करो हमारा--कभी न पूछना कहाँ जा रहे हो कब वापस आओगे ----अचानक खुली आँखों से उसे लगता वह नायिका उसमे समाहित हो गई ---और फिर चीख निकल जाती उसकी -- --उफ़ अब हद हो गई बंद करो यह तमाशा -- साँसे जो गिरवी है न --अरे सांस तो लेने दो --दम घुटता है अब इस मकबरे में --मुक्त कर दो जाने दो मुझे .......कब तक आखिर कब तक ? लोगे मुझसे सात फेरों के गुनाह का बदला ---इसने तुम्हे तो आजादी दी कुछ भी करने की और मुझे बंदिनी बनाया 
बेगुनाह आजीवन कारावास ---
----------------Divya Shukla-------------------
कुछ लाइनें मेरे पन्नों की जो शायेद कभी हो सकता है 
किताब का स्वरूप ले ले ---
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22 -8-2013 
पेंटिग गूगल से

Sunday, 18 August 2013

तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -? --




तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

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एक पहर बीत चला संवाद हो रहा था

परंतु मौन से मौन का --वो कदाचित

मेरे अंतर्मन में झाँकने का प्रयास कर रहा था

सुनो तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

घने जंगल में...नदी तट पर -----------

भूधरों की ढलान पर....अचानक वो पूछ बैठा

उत्तर की प्रतीक्षा में वह मेरा मुख देखता रहा

और मै न जाने कहाँ थी उसका प्रश्न मथ गया

मेरे मन मस्तिक्ष को उथलपुथल सी मच गई

मुंदी आँखों में बस दिख रही थी सांभरी की दो आँखे

वो आँखे मानो दर्पण में स्वयं को देख  रही थी --------

उत्तर दो न देखा कभी तुमने ? मेरा हाथ हिला कर वो बोला

चौंक उठी न जाने क्या सोचती रही अचानक ही बोल पड़ी

न नहीं देखा कभी --पर कल्पना की है घनघोर बन में भटकती

- कभी घात लगाये सिंह के पंजो की आहट से  सहमी

-तो कभी बन के भयानक कुत्तों के  विभत्स स्वर से

भौचक औचक सी सांभरी प्यास लगने पर भी

नदी के समीप जाने का साहस नहीं जुटा पाती

--घनी कटीली झाड़ियों से स्वयं को ढंक लेती

चुभते कांटो से धीमे धीमे बहता रक्त ---------

------------ और उस वेदना को  धीमे धीमे पीती

साँभरी के पीड़ा से रक्तिम नेत्रों को --------------

बस कल्पनाओं में ही देखा है ----बोलती जा रही थी मै

गोधूलि बेला अस्ताचल को जाते सूर्य --को देख रही थी

और वह लगातार कुछ बूझने का प्रयास कर रहा था

मौन पसरा रहा संध्या का धुधंलका फैलने लगा

परन्तु मौन का संवाद तो था --उत्तर प्रत्युत्तर भी

बिन बोले ही सुन लिया सब उसने-------------

------------- और फिर अत्यंत मध्यम स्वर में कहा

सांभरी की व्यथा स्पष्ट उभर आई है तुम्हारे मुख पर

मानो तुमने ही जिया हो -- मेरा एक आग्रह मानोगी ?

तुम्हे सांभरी कह सकता हूँ --जानती हो क्यों

तुम दोनों के नेत्रों में कितना साम्य है तुम्हे नहीं पता -

अरे न ना उत्तर दिया मैने -----आखिर क्यों नहीं कह सकता ?

सिंहनी हूँ --- सांभरी नहीं कह जोर से हंस पड़ी मै

अब कैसे कहूँ उसे -शायेद -वो नहीं समझ पायेगा

कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रहें तो अच्छा है -----

------------Divya Shukla---------------

(सांभरी --हिरणी )

18 -8-2013

पेंटिग गूगल से
 

Saturday, 17 August 2013

हर दीवार पे टंका एक ही चेहरा !




हर दीवार पे टंका एक ही चेहरा

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दीवार पर टंका वो चेहरा

पास आ जाता है सिमट के मेरे

अब मै तन्हा नहीं होती

उस चेहरे पर टंकी है सिर्फ

दो बड़ी बड़ी गहरी काली आँखे
--
बोलती है मुझे पहचानो

अब तुम ही बताओ ?

तुम्हारी आँखों में ड़ूबने के बाद

अपनी ही सुध कहा रह गई

उफ़ वो तिलस्मी फिर से मुझे

बहला गया सिर्फ आँखों से

मुस्करा के एक सवाल छोड़ गया

कौन हूँ मै तुम्हारा अपना सा

जरा पहचानो तो मुझे --

एक हल्की सी मुस्कान तिर गई

मेरे होठों पे --सुनो जानती हूँ तुम्हे

मै तो बहला रही थी तुम्हे

तुम भले सामने न आओ

मै आँखे मूंद कर भी तुम्हे देख लेती हूँ

अब बोलो तो --वो आँखे मुस्करा दी

जरा देखो तो तुम्हे मेरी आँखों ने

सहेज़ लिया है ----पलकों में

उफ़ ये कौन किसकी आवाज़ है ये

ओह तो तुम हो हर दीवार पर टंके हुए

सुनो एक बात कहूँ --तुम्हे पता है ?

अच्छे हो तुम ------- 


अच्छा दिल की बात सुनो --

तुम्हारी निगाहों की हदबंदी में

बड़े महफूज़ से रहते है हम

--------Divya Shukla -------

१७ -८ -२०१३

तस्वीर गूगल से
 — 

Monday, 12 August 2013

प्रतीक्षित हूँ ---बोलो न -----



प्रतीक्षित हूँ ---बोलो न

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मेरे सपने किसी भी परिधि से परे हैं

धरा से अम्बर तक -सागर की अनंत गहराईयों से

दूर छितिज तक ---अद्धभुत है विलक्षण है

समझ से परे है क्यूँ की वो मेरे है

जीवन की उलझनों के बीच वो पलते है

मेरी आँखों में -- टूट नहीं सकते कभी

वो मेरे है न --उन्हें समझने के लिए

तुम्हे मेरी आँखे मेरा मन बनना होगा

खोलना होगा ये बंद मुट्ठी --------

इनमें बंद है उन सपनो का भ्रूण

जिसे सहेज़ रखा है मैने ---------

-------अजन्मे बच्चे की भाँति

पोसना है अभी उसे ----------

------- धरा से खींच के

आकाश तक फैलाना होगा -----

-------काश ये समझ पाते तुम

सपने केवल स्वप्न बन के ही न

----रह जायें ---उन्हें यथार्थ में

बदलना भी मेरा सपना है ------

-----कर सकोगे तुम ? यह सब

चल सकोगे मेरे साथ ?------

सुनो ? अनुत्तरित न छोड़ना

प्रतीक्षित हूँ --बोलो

--------Divya Shukla-------

12-8-2013

Sunday, 11 August 2013

माँ और मायका ----



माँ और मायका --

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माँ और मायका इनकी याद की तो

हर औरत के पल्लू में गाँठ सी बंधी होती है

यह गिरह न निकलती है और न ही कभी ढीली पड़ती है

कहने को एक छोटा सा लफ्ज़ है माँ -

लेकिन इसके कहने से दिल को जो सुकून मिलता है

वह यूँ महसूस होता है जैसे कड़ी धूप में ठंडी छाँव हो

ऐसा ही घना दरख्त है माँ ---

हमारी माँ जिनको आज हमारे सहारे की ज़रूरत है

उम्र के इस दौर में कितनी अशक्त हो गई माँ बीमार भी

सहारा ले कर चलती है ---अक्सर मुझे नींद नहीं आती

पर माँ पास होती है उनका हाथ पकड़ के आज भी सो जाती हूँ

कोई दवा कुछ नहीं घर का गेट बंद है या नहीं इसकी भी फ़िक्र नहीं

हम हर फ़िक्र से निश्चिन्त होते है पास में सोई हुई माँ होती है ना

कितने सुकून की नींद आती है --माँ को चिढाते छेड़ते उनसे डांट खाते

आज हर पल ये भी लगता है न जाने कब ये चुपके से हाथ छुडा लें

आज बहुत याद आया मायका और अपनी मम्मी

नागपंचमी आज जिसे हमारी तरफ गुडिया भी कहते है

माँ हमारी हथेली में मेहंदी लगाती दियासलाई की तीली या

सींक से मेरी फरमाइश होती मोर चिड़िया बना दो मम्मी

और वोह कुछ भी लगा देती हरा फ्रोक बनाती खुद से

बहुत गुणी है माँ बिलुकल डिजायनर सिलती --

बहुत कम रही माँ के साथ सिर्फ पन्द्रह साल की उम्र तक

उसके बाद कभी नागपंचमी पर हमने मेहंदी नहीं लगाई

कल नींद नहीं आई हमें बहुत सोचते रहे -- सुबह माँ को फोन भी किया

आ जाओ न हमारे पास तुम्हारा हाथ पकड़ कर सोना है हमें

जब से तुम गई हो सो नहीं पाई गहरी नींद --डांट लेना जितना चाहो

हम बदले नहीं वैसे ही दुष्ट है पर आ जाओ न माँ हमें नींद नहीं आती

-------------------Divya Shukla-----------------------

11-8-2013

स्केच  गूगल  से  साभार 

Wednesday, 7 August 2013

रोप दो एक पारिजात मेरे मन में --



Monday, 5 August 2013

वो कौन सी डोर थी ---




वो कौन सी डोर थी ---

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मृगनैनी को यार नवल रसिया --आह

पंडित जी की सम्मोहती आवाज़ जिसे

आँख मूंद कर सुनना गजब की अनुभूति

एक अनिर्वाच्य आनंद --अद्भुत सुख

आज नींद न जाने कहाँ जा कर सो गई थी

-रात्री का तीसरा पहर बीत रहा था

दूज का चाँद इठला कर मुंह चिढ़ा रहा था

धीरे से अर्धनिंद्रा में डूबते उतराते हुई

न जाने कब कैसे मै वहां पहुँच गई जहाँ

जहाँ चारो ओर पहाड़ और दूर से उन पे जमी बर्फ

जो रात्री में सीप सी चमक रही थी

दूर तक मीलों फैली फूलों की घाटी

एक एक फूल को छूती मानो उनकी

सुगंध को आत्मसात करते हुए मैने

अपना पूरा आंचल फूलो से भर लिया

और चल पड़ी सम्मोहित सी पहाड़ी की ओर

न जाने कौन सी डोर खींचती जा रही थी

और मै धीरे धीरे चढ़ती जा रही थी ऊपर पहाड़ी पर

पहुँच ही गई सबसे ऊपर आखिरी पग रखा ही था

की अचानक फिसल गई तेज़ी से घाटी की ओर

लुढ़कती हुई पत्थरो से घिसटता बदन लहूलुहान हो रहा था

फिर भी मै आंचल के फूल सहेजे रही --ओह ये क्या

अचानक एक हाथ बढ़ा और झट खीच लिया मुझे समेट लिया उसने

और अपने वक्ष में छुपा लिया - शून्य सी न जाने कबतक

- तन्द्रा अवस्था में खड़ी रह गई पता भी न चला

अरे ये मै कहाँ हूँ ? तुम कौन हो ?

अरे मुझे नहीं जानती फिर क्यूँ खोजती हो

क्यों पुकारती हो कभी संगीत में तो कभी

इन फूलों की घाटियों में ---जोर से हंसा

वो अट्टहास मेरे रोम रोम में सिहरन सी दौड़ गई

मेरा आंचल खीच मुट्ठी भर फूल ले उड़ा दिए उसने हवा में

वह हँसता रहा और भर भर मुट्ठी उडाता रहा फूलों को

और मै सम्मोहित सी कभी खुशबू को सांसो में भरती

कभी उड़ते फूलो को निहारती जो घाटी में बरस रहे थे

पर उसका चेहरा क्यूँ नहीं नहीं दिख रहा था मुझे

हाथों के स्पर्श की अनुभूति उसकी साँसों की ऊष्मा

उसके बोल सब का अहसास था पर

उसे पहचान क्यूँ नहीं पा रही थी

कौन हो बोलो न -- सामने क्यों नहीं आते तुम

एक प्रश्न ? और उसका उत्तर क्या दिया पता है

नहीं पहचाना मै तुम में ही तो हूँ विलग कहा

और फिर मेरा हाथ थाम के बोला आओ देखो

उसने दो मुट्ठी फूल  ले आकाश में  उछाल दिए

झरने लगी राख निरंतर और नहा गए दो वजूद

चारों ओर बस सुगंध ही सुगंध फैल गई

तुम पूछ रही थी न कौन हूँ मै --

तो सुनो हम दोनों कौन हैं भूल गईं न तुम

आओ देखो और पहचानो खुद को और मुझे भी उसने कहा

और अपनी तर्जनी से इशारा किया देखो उधर

सुदूर छितिज़ की ओर --और वहां चली जा रही थी

दो  पारदर्शी आकृतियां ----

----------Divya Shukla-------------

5-8-2013

पेंटिग गूगल से अज्ञात कलाकार

Sunday, 4 August 2013

सुन ऐ रूह मेरी -



मै हूँ एक जर्रा

------या नूर 


हूँ फलक का

मेरी रूह आई कहाँ से ?

-----आईने में खुद को देखूं

ये जर्द सा मेरा चेहरा

-----पुरनम सी मेरी आँखे

मुझसे ही सवाल पूंछे

-----वो कहाँ है तेरी मंजिल

तुझे जाना था जहाँ पे

-------सुन ऐ रूह मेरी

खुद की खुदी को मैने

-------ख़ाक में मिला दिया है

सारा वज़ूद मेरा

------अब बस धुआं धुआं है

------Divya Shukla-------

5.8.2013

तस्वीर गूगल से 

Friday, 2 August 2013

सुनो -- तुम सुन रहे हो न --


सुनो -- तुम सुन रहे हो न

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उफ़ -- यही तो रहा बस हमेशा से

जब हमनें कुछ भी कहा-----

------ तुम सुन ही नहीं पाये

या अनसुना करते रहे -----

------जान कर सच कह रहूँ न

अब देखो न --- हम कहाँ पे आ गये

----दरकने लगे रिश्ते ------ठीक उसी तरह

जैसे तुम्हारे हाथ से ----फिसल रहा है

------धुला हुआ --------काँच का ये गिलास

सुनो --चलो एक कोशिश और करते हैं

--- कांच से नाज़ुक रिश्ते को संभालने की

मै भी हाथ लगा देती हूं -----न ये गिलास टूटेगा

-----न ही अब हमारा रिश्ता -----------

एक मौका --एक कोशिश और सही

----------फिर कोई गिला नहीं रहेगा

हमने कोशिश तो की ही ----

-------तुम सुन रहे हो न मेरी बात

या फिर से वो ही पुरानी आदत

---- उफ़ मुझे इसी बात से तो चिढ़ है

बस ये आखिरी बार --फिर तो ---

----------Divya Shukla------------

2-8-2013

तस्वीर गूगल से