Saturday, 28 September 2013

वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?


वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

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सुनो वो मै ही हूँ जो कभी सारी कायनात को ठोकर मार सकती थी

पर अब तुम नहीं जानते राख का एक ढेर सा बन गया है

मेरा अस्तित्व बस एक चिंगारी दबी है उसमे उसे वही दबा रहने दो

और ढंक दो वरना सब कुछ राख हो जाएगा ---तुम नहीं जानते

उस दिन जब मै शांत बैठी थी नदी के किनारे न जाने किस ध्यान में

नदी मुझे लहरों में समेट कर दूर तक ले गई देर तक लहरों के संग

बहती गई दूर तक न जाने कितनी दूर बहती ही जा रही थी और फिर

न जाने क्या हुआ अचानक न जाने कैसे मै ऊपर उठने लगी

मानो फूल सा हल्का हुआ मेरा अस्तित्व और मै आकाश में चल रही थी

घबरा कर नीचे देखा अरे वहाँ भी मै ही थी मै देख पा रही थी स्वयं को
,
नेत्र मूंदे हुए और मुख पर अनोखी शांति लहरों पर सोई हुई बह रही थी

आकाश में बादलों के बीच जो पंछी की भांति उडती फिर रही थी वो भी

मै थी

न जाने कब तक तैरती रही आकाश में बिन परों के फिर थक कर

नदी किनारे पेड़ के नीचे ही बैठ गई सफ़ेद फूलों से भरा अद्भुत पेड़

न जाने कैसी सुगंध थी जो मेरी चेतना पर हावी होती जा रही थी

मेरे भीतर समाती जा रही थी मेरे रोम रोम में बस रही थी -

और मेरी पलकें बोझिल होती जा रही थी मानो सुरापान किया हो

यह कैसी मदहोशी थी बार बार अर्धचेतना में भी कौंध रहा था विचार

अचानक न जाने किसने छुआ और मै लौट आई वापस वो दिखा नहीं

वो कौन था क्या दिखा रहा था ,अचानक सुनाई देने लगे कई मनुष्यों के

 स्वर

वो गूंज रहे थे शांत वातावरण में उच्चारित कर रहे थे लगातार बार बार

राम नाम सत्य है -सामने देखती हूँ तो एक के बाद एक कई शव

 निकलने लगे

मैने उन व्यक्तियों को पुकारा वो पलट मेरी तरफ मुड़े पर

उनका चेहरा नहीं दिख रहा था पर उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी मुझे

अरे तुम्ही को तो दिखाना था यह पहला शव है तुम्हारी आसक्ति का

दूसरा सांसारिक वासनाओं का ,तीसरा सच्चे निस्वार्थ प्रेम का ,चौथा

 तुम्हारी अपेक्षाओं का , बस करो अभी और भी हैं ? क्या मै पूछ बैठी ---
हाँ अभी प्रतिकार और घृणा भी आ रहें है ,नहीं तुम लोगों ने मुझसे

पूछा भी एक बार तो कहा होता अब इन चारों को तो ले ही जा रहे हो

ले जाओ पर वो दो तो अभी मेरे पास रहने दो यदि प्रतिकार और घृणा

 भी न रह गई तो जीवित रहने का क्या अर्थ , या तुम प्रेम को छोड़ जाते

 अब उसे ले गये तो इन्हें तो यही रहने दो मेरे पास यही तो मेरे राख हुए

 अस्तित्व को कुरेद कर

इसमें से वो चिंगारी खोज निकालेंगे जो कहीं दबी हुई है मुझमें ही

और फिर न जाने कैसी हवा चली लौट आई मै वापस न जाने कहाँ से

वो कौन थे वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

-------------Divya Shukla------------------

29-9-2013

पेंटिग गूगल से

Tuesday, 24 September 2013

सुनो !अच्छा छोड़ो तुम नहीं समझोगे




सुनो !अच्छा छोड़ो तुम नहीं समझोगे

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सुनो एक बात कहूँ

पता है तुम्हे अक्सर मै

काफ़ी शाप की कार्नर वाली

टेबल पर जाकर क्यूँ बैठती हूँ

वहाँ तुम होते हो न--जानती हूँ

तुम नहीं हो यहाँ कहीं पर

है तो सिर्फ एक अहसास तुम्हारे होने का

और सामने वाली चेयर खाली नहीं होती

टेबल पर रखी होती है दो कप काफी

जो अब बिना कहे रख जाता है वेटर

अब जब कि वो भी जान गया है

कोई नहीं आने वाला -----

अकेली ही कुछ देर बैठूंगी मै

एक हाथ पे चेहरा टिकाये बैठी

मै गुम होती जाती हूँ तुम्हारी यादों में

उसी तरह चुप सी पर न जाने

कितनी बातें कर जाती हूँ तुमसे

पास बैठे होते हो तुम -मेरे इर्दगिर्द

होती है एक खुशबू तुम्हारे वज़ूद की

कभी लगता है जैसे हाथों को छू लिया

तुमने ---तुम्हारी आँखों की छुअन

मुझे महसूस होती है अनजान बनी मै

न जाने क्या सोच के मुस्करा देती हूँ

फिर मै तुम्हारी चोरी पकड़ लेती हूँ

अरे यह क्या हुआ तुम्हें अचानक

तुम ने घड़ी देखी और उठ गए --

अरे हाँ तुम्हे जाना भी तो है देर हो रही है न

फ्लाइट राईट टाइम होगी -- उफ़ तुम मुड़े

और मेरे कंधे पर अपना हाथ रख दिया

आह जरा सा छू भर गया

मेरा सर तुम्हारे सीने से

पर हम चाह के भी गले नहीं लग पाये

न जाने क्यूँ --हम दोनों में शायेद

हिम्मत ही नहीं --- और फिर अधूरी रह गई

देखो न इक खूबसूरत सी ख्वाहिश

तुम्हारे सीने पर हल्के से सर रख कर

तुम्हारी धडकनों में अपना नाम सुनने की

तुम चल दिये और कोरिडोर में खड़ी मै

तुम्हें जाते हुए देख रही हूँ सोच रही हूँ

पलट कर देखोगे भी या नहीं

और अचानक तुमने पलट कर देखा

मुस्करा कर हाथ हिलाया और फिर

झटके से कार का दरवाजा खोल कर बैठ गये

एक उदास सी मुस्कान दिख ही गई

बहुत छुपाया था तुमने फिर भी

पर कोई बात नहीं -- इतना ही बहुत हैं

मै अक्सर यहीं आती हूँ कुछ देर

तुम्हारे साथ बैठने को ---

ये भी सोचती हूँ पता नहीं

तुम्हे मेरी याद आती भी होगी

या नहीं-----पर मै मुझे छोडो

मेरे साथ तो तुम न हो कर भी होते हो

जाने दो  तुम नहीं समझोगे यह सब

मेरी बात और है न ---

तभी अचानक वेटर बोला

मैम आपकी काफी ठंडी हो गई

दूसरी लाऊं ? मैने इशारे से मना किया

उदास सी मुस्कान तिर गई मेरे चेहरे पर

मै उठ कर चल दी बाहर की ओर

कभी यहाँ आती हूँ तुम्हें जीने

ख्यालों में जीने बस और कुछ नहीं

---------Divya Shukla------------

24-9-2013

चित्र --गूगल से साभार

Saturday, 14 September 2013

द्विरागमन (गौना) का संदूक !!






 द्विरागमन (गौना) का संदूक 
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आज बरसों से बंद पुराना संदूक दिख गया

पुराने कबाड़ वाले छोटे कमरे में

मन फिर उन्हीं गलियों में घूमने और

उन्ही बंद लम्हों को पलटने को
 
मुझे से बार बार कहने लगा --

वो सारी खट्टी मीठी यादें वो सारे पल

जिन्हें बंद कर दिया था ठूंस ठूंस कर इसी में --

फिर सामने आ गये बरसों बाद

पुराने कबाड़ में के बीच से छिटक कर

विवेकशून्य सी आगे बढ़ती गई

और भीतर से कमरे की कुण्डी लगा कर

बहुत देर एकटक तक देखती रही उसे

एक उधेड़बुन चल रही थी एक हलचल सी मच गई मस्तिष्क में

मन एक बार फिर से दोहराना चाह रहा था अतीत को

और विवेक उसे बार बार रोक रहा था ऐसा करने को --

मानो कोई कह रहा हो , मत खोलो दशकों से बंद द्वार के पट

स्मृतियों पर अतीत धूल को यूँ रहने दो बहुत पीड़ादायक होता है

पर जीत मन की हुई विवेक अक्सर हार ही जाता है

आगे बढ़ कर खींचा बहुत वजनी था वह और फिर

बरसों से जमी धूल को धीरे धीरे आचंल से ही झाड़ा

आखिर मायके का बक्सा था --मोह तो बना ही रहेगा

माँ ने दिया था द्विरागमन पर --और फिर एक दिन

सब कुछ इसी में ही बंद कर के ताला जड़ दिया था

आज फिर कांपते हाथो से खोला इसे झलक गई

कुछ साड़ियां रेशमी -जिनकी जरी अभी भी चमक रही है

विदा की रेशमी लाल साड़ी को उठा कर हाथ फेरने लगी

जरी का तार अचानक हाथ में चुभ गया और मन में भी

एक सिंदूर का बड़ा सा डिब्बा भी था उसकी चांदी अब काली पड़ गई है

जिसे थाम कर नए घर में प्रवेश किया था ---शगुन का सिन्हौरा

उसमे अभी भी वही पीला सिंदूर भरा है जिससे मांग भरी गई थी ---

अम्मा की चुनरी थी जो शायेद रस्म के अनुसार

पहली विदा पर मायके जाते समय मुझसे बदल ली थी उन्होंने

अम्मा --मेरी सासू माँ उन्हें मै अम्मा कहती थी

पीले रेशमी किनारे वाली चादर जब ओढाई उन्होंने

नहीं जानती थी वह अपना धैर्य इसमें लपेट कर

मुझे सौंप रही है ---- बहुत चाहती थी मुझे अम्मा

बिना संवाद किये भी हम दोनों में संवाद होता था

अम्मा मेरा चेहरा मेरी आँखे मेरा मन पढ़ लेती थी ---

पर अपने कोख जाये को वो नहीं सिखा पाई अपना ये गुण

और फिर मैने एक दिन सब कुछ समेट कर बंद कर दिया इस बक्से में

माफ करना अम्मा मुझे बहुत कठिन था मेरे लिए सब

मै अनजाने में बुदबुदा रही थी ओठों में ही

न जाने कब तक गुम रहती पुरानी यादों में कि अचानक

एक आहट से चौंक पड़ी शायेद किसी ने दरवाज़ा खटखटाया

------सारा सामान अचानक छूट गया हाथों से --

बिखर गया पीला सिंदूर छिटक कर फर्श पर -------

-----------सारी चूडियाँ छन्न से गिरी और टूट गई

हकबका कर हाथों से ही समेटने लगी मै

--------उफ़ -चुभ गई किरचें उन्हें बटोरने में

------ रिस आईं खून की बूंदे उंगलियों के पोरों पर

निकल आई दिवास्वप्न से बाहर ----------

और एक झटके में बंद कर दिया संदूक का ढक्कन

शायेद फिर कभी न खोलने के लिए ---पर अम्मा

मैने अपने आंसू तुम्हारी चादर में सहेज़ दिये है

आज सूरज पश्चिम से निकला है

झरोखे से सूरज की एक किरण झाँक रही है

मानो बार बार बुला रही हो आ जाओ इधर

अतीत के अंधेरो को दफना कर थाम लो रोशनी की डोर

आखिरकार उठ ही गये कदम रोशनी की ओर

एक नया सूरज एक नई भोर एक स्वतंत्र अस्तित्व

----------------Divya Shukla-------------------

१४ -९ -२०१३

तस्वीर गूगल से

Friday, 13 September 2013

मुक्त कर दूंगी तुम्हें --

मुक्त कर दूंगी तुम्हें -
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न जाने क्यूँ फिसल

जाते हो तुम -----

मेरी मुट्ठी से अक्सर

कितनी भी कस कर

बाँधी हो मैने ----

पर निकल ही जाते हो

अपनी सुविधानुसार

आने जाने के लिए

क्या इसलिए कि

तुम एक पुरुष हो ?

और कोई भी परिधि

या लक्ष्मण रेखा नहीं है

तुम्हारे लिए --क्यूँ होगी

ये सब भी तो

तुमने ही बनाई हैं

सिर्फ हमारे लिए

बस इतना ध्यान रखना

फिसल कर गर्त में

न गिर जाना ---सुनो

अब नहीं निकलूंगी तुम्हे

और बंद मुट्ठी से

मुक्त कर दूंगी तुम्हे

हर  बंधन से  --और

दूर अपने अंतर्मन से

सदा के लिए ----

सुनो एक बात कहूँ ?

क्या तुम नहीं जानते

मुझे राधा से मान

और सीता से स्वाभिमान

आशीष में मिला है

------Divya Shukla--------
पेंटिग  गूगल से साभार

१३ -९-२०१३ 

Saturday, 7 September 2013

काश तू दस्तक न देता ---



काश तू दस्तक न देता
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मैने कहा कौन है तू ?

उसने कहा मुसाफिर हूँ

पनाह चाहिए तेरे दिल में

मैने कहा जंग लग चुकी है

अब दिल के इन दरवाज़ों में

खुलते ही नहीं किसी के लिए

उसने कहा मेरी धीमी धीमी दस्तकें

तुझे इन बंद दरवाजों को खोलने पर

मजबूर कर ही देंगे --कुछ इस तरह

खुल ही गए बरसों से बंद दिल के दरवाजे

किये इश्क के वादे सूफियाना अंदाज़

खुद से बढ़ के चाहने का दावा

ता कयामत न बदलने का भरोसा

एक कश्ती के मुसाफिर बाँट ही लेते है

आखिर अपनी तन्हाई और रतजगे --

मैने पूछा वो कौन सी चाहत है

जो तुझे यहाँ लाई मुझ तक

मुझमें तो ऐसा कुछ भी नहीं

वो बोला --सब कुछ तो है जो

मेरी चाहत है तू मेरा ख्वाब है

अब तक कौन था तेरा बोल न ??

तेरा ख्याल बस शबनम सा पाक

और मै उड़ती रही बस उडती ही रही

बिन परों के परिदे की तरह उस की ओर

और वह किसी जादूगर की तरह

हावी हो गया होशोहवास पे --

कुछ इस तरह ज्यू वो शीशा हो

अपना अक्स देखती रही उस में

वो खुश तो मै मुस्कराई :)

वो रंजीदा हुआ तो तल्खी से भर गई मै

और फिर एक दिन वो बिन बताये

खो गया ठीक उसी तरह जैसे आया था

बिन बुलाये ----एक यकीन था उस पे

खुद से ज्यादा -बहुत खोजा आवाज़ भी दी

ढूंढते ख़ाक छानते देखा तो खड़ा था

भीड़ के बीच मुस्कराते हुए ---कोई गम न था

उसके चेहरे पर मुझसे बिछड़ने का ---

पर मै आजतक सोचती हूँ उसने ऐसा क्यूँ किया

कभी मिले तो बस इतना कहूँगी ---उससे -

काश तूने दस्तक न दी होती --ख़ैर कोई बात नहीं

तू खुश रह मेरा क्या मै तो संभल जाउंगी

पर तू जब बिखरेगा तो ? तेरा क्या होगा

 रब ख़ैर करे ---

------Divya Shukla---------

पेंटिग गूगल से साभार

Thursday, 5 September 2013

और मैने वो इंतजार लिखवा लिया !!

और मैने वो इंतजार लिखवा लिया !
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--------मैने हाथों में मेहँदी रचाई

हिना की खुशबू  में मदहोश---------

-----भटकती रही -रात भर

न जाने कहाँ कहाँ -

--उफ़ कितना सुर्ख रंग चढ़ा

मेरी हथेलियों पे

और सोचने लगी ऐसा कैसे हुआ

सुना है सुर्ख हिना तो इश्क की

गरमी से रंग लाती है

हैरान परेशान सी मै-

-अनगिनत सवाल लिए

अपने रब से ----रूठ रूठ के-

कौन है वो ?-----कहाँ है वो ?

जिसे तूने मेरे लिए बनाया है

और ये हिना क्यूँ सुर्ख उतरती है

मेरी हथेलियों में बोलो ना ?

न जाने कब तक उलझती रही

अचानक आवाज़ आई ---

देख मैने ना जाने कब से

गूंध कर रखी है ये मिटटी

पर पुतला न बना पाया

आह पता है क्या कहा

मेरे प्यारे रब ने ---

अरे पगली मांगे भी तो

कितनी अजीब हैं तेरी

अब कहाँ मिलता है ये सब

अब कैसे बनाऊं जैसा तू चाहे है

मिटटी गूँधी है पर खोजे से भी

न वफ़ा मिली न वो मोहब्बत

अब तू ही बोल बना दूँ या

फिर लिख दूँ तेरे हिस्से में

एक और जनम का इंतजार

और मैने वो इंतजार लिखवा लिया

अपने हिस्से में एक और

जनम का लम्बा इंतजार

-------Divya Shukla----------

5.9.2013

पेंटिग गूगल से आभार --

Monday, 2 September 2013

आज मंदा उदास है न जाने क्यूँ ?



आज मंदा उदास है न जाने क्यूँ ?
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बहुत दिनों बाद आज फिर

मेरे कदम उठ गये तट की तरफ 


मेरी प्रिय शरणस्थली की ओर

अस्त होते चाँद की छाया

मन्दाकिनी के जल में हवा के

हल्के झोंके से ऐसे हिल रही है

मानो चाँद रह रह कर काँप उठता हो

चांदनी मुरझाई सी थी --उसके हाथ में

खत था पत्ते पर लिखा हुआ

और थरथरा रहे थे उसके हाथ --

पीड़ा उभर आई थी मुख पर

दर्द से वो पत्ता भी पीला पड़ गया था

शायेद दर्द से --हाँ दर्द ही से

जाने खत में क्या लिखा था

प्रश्नवाचक निगाहें उठी चांद की ओर

पर वो कहाँ था --वो तो जा चुका था

अस्त हो गया था ---और फिर उसके साथ ही

चांदनी का अस्तित्व भी विलीन हो गया

सारा दर्द मंदाकनी की लहरों को सौंप कर

जो सदियों से बह रही है सबका दर्द समेटे

बिना कुछ कहे बस मौन निशब्द निर्विकार --

सोचती हूँ कभी सखी मंदा के सब्र का बांध अगर टूट गया तो ?

क्या वह सागर तक पहुँचने की प्रतीक्षा कर पायेगी---शायेद नहीं

अभी तो वह मौन है उदास है ---बहती जा रही है कुछ सोचते हुए

शायेद यही कब तक समेटूं इन सबकी पीड़ा और क्यूँ ?

और मै निशब्द बैठी सुन रही थी मंदा की आत्मा की आवाज़

मौन से मौन का एक सशक्त संवाद चल रहा था हमारे बीच

वो सदियों से मै दशकों से एक सी ही तो हैं हम दोनों

ये भी एक साम्य है जो हमे खींचता है

और मै खिंची चली आती हूँ तट पर ----

आपस में बांटने पीड़ाओं को -नन्हे नन्हे सुख भी

पर इस बार बस संकेतों में कह गई वह सब

कुछ छुपा भी गई -- सुनो ! फिर आऊँगी तुमसे पूछने

अभी तुम्हारी हलचल मेरे मन में समां गई है

वही लेकर जा रही हूँ आज ---चलती हूँ

फिर आऊँगी ----मुझे तुम से बहुत कुछ कहना है

बहुत कुछ बांटना है ---एक दूसरे से

----------Divya Shukla--------------
2-9-2013

तस्वीर  गूगल से -