Thursday, 24 October 2013

नारी मन का अनगूंजता गीत ---



मन का अनगूंजता गीत
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न जाने क्यों आज मन किया
कलाई से कुहनी तक पहन लूँ
हरे कांच की रेशमी चूडियाँ 
भर ऐड़ी कलकतिया महावर
पूरा पांव चटख लाल रंग वाला
लगा के बिस्तर की सफ़ेद चादर पर
छाप दूँ ढेरों पाँव के निशान
--जैसे पहले करती थी --और फिर
खूब बजनी पाजेब भी पहन लूँ
ढेर सारे घुंघरू वाली ----
और हाँ घुंघुरू वाले बिछुए भी
वो भी तीनो उँगलियों में डाल कर
लाल हरी बांधनी चुनरी पहन -
किसी ट्रक या ट्रैक्टर की ट्राली
पर लदे पुआल के ढेर पर खड़े हो कर
अपना आंचल हवा में उड़ाते हुए
जोर जोर से गाऊं --
तोड़ के बंधन बाँधी पायल
न जाने क्यूँ जब भी फिल्म के
गीत में नायिका को देखती
तो कल्पना में खुद को वहाँ पाती
पायल बिछिया कंगन चूड़ी
जब बजते तो मन के सात सुर बज उठते
यह बंधन नहीं मन के तार है जरा सुनो तो
तुम ने हाथ पकड़ भर लिया और चूडियाँ धीमे से खनक उठी
मानो कह रहीं हो छोडो न मेरा हाथ अब जाने दो
और जब गुस्सा आता है तो जोर से जता देती है
पर न जाने क्यूँ तुम्हें नहीं पसंद इनके बोल
जब भी मै छम छम पायल पहन के चलती
और छनक जाते घुंघरू या भरे हाथों की चूडियाँ
खनखनाती तो झुझला उठते तुम आखिर क्यूँ ?बोलो न
तुम्हारा तो चुभता हुआ बस एक ही वाक्य
तीर की तरह लगता सीधे दिल पर
लगता है बंजारों की बस्ती से आई है
तभी तो कितने गंवारू शौक है ---
उस पर जब यह भी बोल कर हंस भर देते तुम
सुनो ये लाल सडक क्यूँ बना रखी है सर पर
तो जलभुन जाती मन ही मन ---- फिर तो
मै दे मारती गुस्से में एक जोरदार डायलॉग
सुनो -एक चुटकी सिंदूर की कीमत
क्या तुम नहीं जानते बाबू
इतना श्रिंगार करने की आज़ादी
तो मिलती ही है न ----वरना माँ कब
करने देती ये सब ----उफ़ वो बचपन ही तो था
फिर एक दिन सब उतार के फेंक दिया
रोज ही सुनना पड़ता बंजारन हो क्या
ढेरों लाल हरी चूडियों की जगह बस
एक कड़ों ने ली पाज़ेब के घुंघरू मौन हो गये
आज वो बंद पिटारी सब दिख गया
और पायल उठाने पर जब घुंघरू बजे
तो मन के तार फिर झनझना गए
काश की तुम समझते
यह न तो गँवारपन न ही बंधन है
यह तो नारी मन का संगीत है
जो उसकी हर हलचल पर बजता है
पायल बिछुए चुडियों के मधुर स्वर  में
नारी मन का  अनगूंजता गीत है
-------Divya Shukla---------
25-10-2013
पेंटिग गूगल से

Wednesday, 23 October 2013

सुनो ! तुम नहीं जानते




तुम नहीं जानते ?
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आज न जाने क्यूँ

तुम बहुत याद आ रहे हो

तुम्हारे पास बैठ बस

तुम्हे निहारते रहने को

दिल कर रहा है

बिना बोले न जाने

कितनी बातें करनी हैं

तुम्हारी प्रतीक्षा में -

मेरी निगाहें रह रह के

दरवाज़े पे टहल आती हैं

हवा से भी जब सांकल बज उठती

तो बार बार तुम्हारे ही आने का

भरम होता है ---पता नहीं क्यूँ

तुम्हे भी मेरी याद आ रही है न ?

तुम नहीं हो -यहाँ -जानती हूँ

जानते हो तुमसे ज्यादा

तुम्हारे होने का अहसास

प्रिय है मुझे --हैं न अजीब सी बात

देखो फिर न कहना कभी

कहा नहीं मैने ---मै कहाँ कह पाती हूँ

अब कल की ही तो बात है

जब तुमने कहा था ---

तुम्हे इश्क है मुझसे -


पता है तुम्हे -----

इक जलतरंग सी बज उठी थी

कानों में सुन कर ---

कान की लवें गर्म हो गई

पलकें अकेले में भी झुक गई थी

फिर यही सवाल मुझसे भी पुछा तुमनें

नहीं बोल पाई कुछ ---

जब की फोन पर थी --

तुम सामने भी नहीं थे --

अगर झूठ कहना होता तो

तो कह ही देती ---पर सच बोलना

बहुत मुश्किल है न  ---लो सुनो न

हाँ मुझे भी इश्क है तुम से

कितना मुश्किल है ये कहना उफ़

बिना कहे क्या नहीं समझ सके तुम

कितने खराब हो तुम --हटो जाओ भी

------Divya Shukla----------

23-10-2013

पेंटिंग गूगल से साभार

Thursday, 17 October 2013

जब अंतिम विदा दी थी मैने !!


जब अंतिम विदा दी थी मैने

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मैने यादों की पोटली फेंक दी है

नहीं सहेजना इन्हें --अब बहुत हो गया

इसमें समेट कर बाँध दिया था

तुम्हारा विश्वासघात उफ़ वही तो अब

सबसे ज्यादा गंध मार रहा था

उसकी अप्रिय गंध  से जीना दूभर हो गया था

मेरे प्रतिकार करने पर त्रियक होठों से

ह्रदय को भेदती तुम्हारी मुस्कान

नहीं भूलती उस दंश की पीड़ा

तुम नहीं जानते कितना कुछ

खो दिया था उस पल तुमने

कल तुम जब मेरे समीप बैठ

प्रयास कर रहे थे बार बार

टूटे तारों को जोड़ने का और

न जाने कितने उदाहरण दिये थे

शाश्वत होते हैं सात जन्मो के रिश्ते

और यह भी कहा मुझसे

जल को कितना भी छुरी से काटो

वो कहाँ बट पाता है दो भागों में

पर तुम क्यों भूल जाते हो यह बात

प्रेम के धागे को तोड़ कर भला

कोई जोड़ पाया है कभी गाँठ पड़ जाती है न ?

तुम नहीं जानते मैने कितने मान और अधिकार से

तुम्हारे वक्ष पर अपना सिर रख कर सुनना चाहा था

अपना नाम तुम्हारे ह्रदय की धडकनों में

परंतु वहाँ मै नहीं कोई और था --सुनो और तब

मैने कहा था न तुम जा तो रहे हो ----

पर मै तुम्हें आवाज़ नहीं दूंगी न अभी न फिर कभी

पीछे से आवाज़ देना मेरी आदत नहीं जानते ही हो तुम

तब हंस दिये थे न तुम और मै नम आँखों से देखती रही

तुम्हें जाते हुये तभी अपने रिश्तों को अंतिम विदा दी थी मैने

मुझे पता था मैने कहा भी था तुमसे तुम आओगे वापस

पर उस दिन तुम याचक होगे ---और मै

मेरे पास कुछ नहीं होगा तुम्हें देने को

अब कुछ नहीं बचा कुछ नहीं बाकी

सुनो !अब मै कह रही हूँ तुम जाओ

मरे हुये रिश्तों के शव यहाँ नहीं रखे जाते

--------------------दिव्या -----------------

17-10-2013

पेंटिग गूगल से

Wednesday, 16 October 2013

जिंदगी अब जिद नहीं करेगी !!




 जिंदगी अब जिद नहीं करेगी

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कल रात टुकडो में

टूट टूट कर बिखरता रहा चाँद

और जिंदगी बेबस सी देखती रही

जैसे खुद उसका दर्द पी रही हो

हर एक टुकड़े पे कुछ लिखा था

कुछ माफियाँ थी कुछ तलाफियां भी

किसी पे बेबसी तो कई पे दुश्वारियां थीं

गलतफहमियां थी और लाचारियाँ भी

पर नहीं थी तो किसी टुकड़े पर

नफ़रत नहीं थी ---बहुत ढूंढा

तो एक नन्हा सा टुकड़ा चमका

धुंधले अक्षर में मोहब्बत लिखी थी

जिंदगी की आँख से टपके दो बूंद

आंसू सब कह गए बिन बोले -----

--जिंदगी अब जिद नहीं करेगी

चाँद के टुकड़े बटोर के ---फिर से

एक नया चाँद बना देगी

------Divya Shukla-------

15-10-2013

पेंटिग गूगल से

Saturday, 12 October 2013

ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे !!







ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे
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सुनो --तुम कह तो रहे हो परंतु पाँव में बंधी सांकल कैसे तोड़ दूँ
हाँ वो मै ही हूँ जो इस कायनात को ठोकर मार सकती थी कभी
फिर क्यूँ कमजोर पड़ रही हूँ सोचती हूँ फूलों में गुजरने का समय तो 
कांटो को चुनने में गुजर गया या सोच लो हमने ही स्वयं गुज़ार दिया
तुम नहीं जानते उन कांटो की पीड़ा बहुत कम थी इन जहरीले फूलों के दंश से तो बहुत ही कम तुम जानते हो वो लोहे की मजबूत सांकल जो कैदीयों के पांव में बांधते है उन्हें क्या कहते है वो बेडियाँ कहलाती है न ? ऐसी ही एक बेड़ी कब की तोड़ डाली मैने
-कब तक भागती कहाँ तक भागती --उससे वो व्याघ्र था -एक चतुर व्याघ्र
उस सुनहरी गुफा के हर कोने में खोजती उसकी दो पैनी निगाहें हर समय इर्दगिर्द होती
मानो शरीर से हड्डियों तक आरपार देख रही हो मौका मिलते ही दबोच लेते दो भयानक पंजे जिनके नख बहुत पैने थे --जबड़े बहुत भयानक ऐसे की समूची हड्डियों तक को निगल जायें ---परंतु हिरणी निकल गई उस के पंजे से सुरक्षित
आत्मा में धधक रही प्रतिशोध की अग्नि लिए परंतु आहत मन पर खरोंचे भी थी
--सोने की उस लंका को दुत्कार गहबर बन में भटकने अपने छौनो के साथ सारे साम्राज्य पर निर्द्वंद राज्य करने वाला व्याघ्र तिलमिला कर रह गया
वह नहीं भूला अपनी हार -----हाथ आई उसके केवल टूटी हुई कड़ियाँ
उसे ढूंढता है मन में लिए प्रतिकार एवं अवसर मिलते ही करता है आघात बार बार
सांकले तोड़ दी मैने ---टूटी सांकलों की कड़ियाँ सहेज़ रखी है उसने ---
अब थक गई हूँ बंद लिया स्वयं को गुफा में --रोशनी एक किरण बस बहुत है मेरे लिए
परंतु मै हारी नहीं हारूंगी भी नहीं --लंका ध्वस्त करने का हौसला जुटाती हूँ अब भी
मै सीता नहीं पर पथभ्रष्ट भी नहीं वो राम नहीं पर रावण के साथ था फिर कोई और उपाय भी नहीं था लंका त्यागने के सिवा ----अतीत चुभता है वर्तमान मुंह चिढाता है -- हाथ खाली हैं ममता संबल है परंतु नन्हे छौने अब स्वालम्बी हैं बन में अपना रास्ता स्वयं बना लेंगे -- मोह धीरे धीरे खतम हो रहा परंतु सत्य यही है वैराग्य नहीं मन में क्रोधाग्नि धधक उठती है प्रतिकार की --एक छण को घृणा होती है विश्वास नहीं होता अब कहीं किसी पर -----एक पल कोमल भाव उठे नहीं कि व्याघ्र के तीक्ष्ण नख न जाने कहाँ से सामने आ जाते और दूर छितिज में टंकी दो आँखे दिखती जो सब देख कर भी मुंद जाती थी शायेद धन का पलड़ा भारी था उन पर अग्नि के समक्ष लिए वचन स्वर्ण की सुनहरी आभा के आगे बिसर गये --- घिन आती है उन पर ही अपराधी वही है --सत्य यही है रक्षा का वचन लेने वाला ही अपराधी होता है न अगर वह अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए वह भी लोभ में --सांकले तो अब भी हैं पर --शायेद नियति में यही लिखा है --आखिर रक्त पिपासु व्याघ्र से कहाँ तक लड़ पायेगी हिरणी --समाज भी तो समर्थ के होता साथ है सत्य के साथ तो अधिकांशतः अपने भी नहीं होते !!
------------------------Divya Shukla-------------------------
कुछ कहा कुछ सुना --इर्दगिर्द से

12-10-2013

पेंटिग गूगल से





Thursday, 10 October 2013

बुत जो मोम रहा न पत्थर !

बुत जो मोम रहा न पत्थर 


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सुनो ! मेरे सवालों का जवाब दो न

जिंदगी अक्सर यही कहती

और मै जान कर अनजान बन जाती

तुझे नहीं पता सारे सवालों के जवाब

न जाने किन किन अँधेरी गलियों से

गुजरते है और फिर आ के

अटक जाते है हलक में सारे शब्द

वो अक्सर बाहर नहीं आते ----और फिर

यही सजा बन जाती है उन जुर्मो की

जो कभी किये ही नहीं -- फिर बेइंतिहा घुटन

ओह अचानक Cell Phone बज उठा ---

चौंक पड़ीऔर फिसल गया हाथ से

क्रिस्टल का वो खूबसूरत कीमती शोपीस

उसके टूटने की आवाज़ --और लगा

मेरा पूरा वजूद इसी तरह बिखर रहा है

पता है क्रिस्टल क्यों प्रिय है

कुछ कुछ खुद को कम्पेयर करती हूँ न

पारदर्शी कांच ही तो है मन की ही तरह

कभी मेरा Passion रहा ये क्रिस्टल आज भी

बिखरे टूटे मन को सुकून देता है

खुद को तलाशा तो हर कट में

एक साथ कई चेहरे झलकते हैं

खुद से सवाल जवाब करते हुये

मेरे भीतर चलते हुये झंझावात को

कभी उलझाते कभी दंश देते

अपने पैने नखों से उन जख्मों की

सूखी परतें उधेड़ते जिन्हें दफना दिया था

बरसों पहले पुराने विस्मृतियों के कब्रिस्तान में

आज फिर छन्न से टूटा कांच का बुत

दौड़ गई दर्द की लहर नसों में

कभी हर्दय की पीड़ा तो कभी टूटे हुए

टुकड़ों को बटोरने में लहूलुहान हुई

उँगलियों से रिसते रक्त की मीठी पीड़ा

और उस पीड़ा को घूंट घूंट पीती जिंदगी

गुज़र रही थी एक नक़ाब ओढ़े हुये

कुछ सफर ऐसे भी होते है जो खूबसूरत है

पर उनकी कोई राह उस गली से नहीं जाती

जहाँ एक पूरा वजूद अपनी ही चुनी हुई

तनहाइयों में भटकता है--अभिशप्त आत्मा सा

खुद से सवाल करता --जवाब भी खुद ही देता

पता ही न चला कब धीमे धीमे

उम्र की दहलीज़ें फलांगती गई -पर

आज भी खुद को उसी जगह पाया

जहाँ से मोम का वजूद पत्थर में

बदलने लगा -उफ़ न पत्थर हुआ

न ही मोम रह गया -----

और जिंदगी वो तो गुजरती रही

ख्वाबों में जीते हुए -----

भला ख्वाब भी किसी के हुए है

हकीकत और सपनो की दुरी का

अहसास होते ही --छन्न से टूटता है कुछ

जिंदगी घुटने लगती है और फिर

अपनी ही हंसी खोखली लगती है

लगता है साँसे तो चल रही हैं

पर पूरा वजूद मुर्दा हो गया

आँखे मूंद कर ऊँची इमारत से

छलांग लगाने की कल्पना भी

एक सुखद सा अहसास देती है हवा में तैरने का

ओह कहाँ खो गई थी क्या सोच रही थी

अचानक Maide ने Door knock किया

दीदी Green Tea लीजिए आपको कहीं जाना भी है

नही अब आज और कहीं नहीं जाना मुझे

देर हो गई बहुत अब बस वही जा कर आती हूँ

और ड्राइवर से गाडी बुकशाप की ओर

मोड़ने को बोल आँखे मूंद ली ---

----------Divya Shukla------------

11-10-2013

पेंटिग गूगल से 

Tuesday, 8 October 2013

सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना




सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना

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बालकनी में खड़ी मै देख रही हूँ

उन सूखे पत्तों को जो बिछ गए हैं

मेरे गेट के सामने वाली सडक पर

-जो पूरी तरह से ढंक गई है ---

पीले भूरे चितकबरे पत्तों से ---

ईवनिंग वाक का वक्त हो गया

मै उतर आई नीचे चप्पलों में ही

न जाने किस सोच में गुम थी

मैने sneakers भी नहीं डाले पांव में

और चल दी इस सुनसान सडक पर यहाँ

लोगों की आवाजाही कम ही है ---लिंक रोड है न

तभी पत्ते भी बिछे रहते हैं करीने से

धीमे धीमे चलते हुए कोशिश कर रही हूँ

पत्तो की आवाज़ में कुछ सुनने की

जब तुम जा रहे थे इसी सडक से

तेज़ी से गुस्से में जाते हुए तुम्हारे जूतों की

खटखट आवाज़ और पत्तों चरमराहट

दोनों एक दुसरे में मिल गई थी --

तुमने तब पेड़ों की तरफ नहीं देखा था

वहां तब भी नई कोपलें फूट आई थी

आज भी वैसी ही हैं --सूखे पत्ते भी नीचे बिछे है

मै रोड इस छोर पर खड़ी बस यही सोच रही हूँ

काश उस छोर से तुम अचानक आ जाओ

मुझे तुम्हारे क़दमों और सूखे पत्तों की आवाज़

मिलीजुली आवाज़ का इंतजार है --

बस कब तुम्हारा गुस्सा खतम हो

और तुम अचानक बेल बजाओ ---

पर देखना ज्यादा देर मत करना --

ध्यान रखना कहीं देर न हो जाए

आखिर हर बात की एक हद होती है

-ठीक वैसे ही जैसे पतझर का भी

एक मौसम होता है बस चंद दिनों का --

-------Divya Shukla-----------

Thursday, 3 October 2013

सुनो जिंदगी ---



सुनो जिंदगी ---

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जिंदगी सुन रही हो न ?

कितनी जिद्दी हो तुम

जरा मेरी बात भी सुना करो

कभी खुद से बाहर भी रहा करो
 
जरा झाँक कर देखो तो सही

आसमान में बादलों का लिहाफ है

ओढ़ कर उसे कुछ ख्वाब बुनो

धूप में चांदनी जलती है देखो

कतरा कतरा धूप भी पिघलती है

सूरज की आँखों में भी नमी झलकती है

चाँद की तपिश से कभी रात जलती है

पर जिंदगी मै तुम्हें खोजती फिरती हूँ

देखो कोई आवाज़ देता है मुझे बहुत दूर से

जिंदगी तुम कहना उससे जरा देर वो थम जाए

ऐसा न हो कि ये पत्थर ही दरक जाए ---

सदियों से जमी बर्फ पहरों में नहीं पिघलती

पूछना उससे क्या लगती हूँ मै उसकी

मै उसकी कोई नहीं फिर भी कुछ तो है

हम दोनों में जो खीच लाता है न जाने क्यूँ

कुछ सवाल इधर से कुछ जवाब उधर से

तुम जाओ तो सही जिंदगी वरना शाम हो जायेगी

अपनी शाम के सूरज को तुम ढलने ना देना

घूंट घूंट पीना पिघलती धूप को

कभी फूंक मार कर जलती चांदनी को

बहुत खूबसूरत हो जाओगी तुम ओ जिंदगी

फिर आ कर मिलना मुझसे

यही इसी जगह इंतज़ार करुँगी तुम्हारा

ओ जिंदगी जाओ --जी लो अब हर पल को

-------Divya Shukla-----------

3-10-2013

पेंटिग गूगल से

Tuesday, 1 October 2013

भटक रहीं है सतरूपा ,ईव और हव्वा की बेटियां




क्या स्त्री मात्र एक देह है ?

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स्त्री मात्र एक देह है ?

------या देह से इतर भी कुछ है

-इन्ही प्रश्नों में उलझी --------

------जीवन कंटीली पगडंडियों पर

भटकती हुई स्त्री यह अब भी नहीं जानती ----

-----जिस दिन से वह ठान ले

और अपना विस्तार करना चाहे तो

-----पूरी कायनात उसके लिए

बहुत छोटी पड़ जायेगी -----

------ जब घटने पे आयेगी

तो मुट्ठी भर राख में तब्दील हो जायेगी

--------वह निरंतर आगे बढती रहती है

अपने पीछे छोडती हुई -----

-----पथरीली राहों के नुकीले पत्थरों से

घायल रक्त से सने ---------

----युगों तक न मिटने वाले अपने पग चिन्ह

--------नारी जीवन का यथार्थ बड़ा कटु है

उसके जीवन की पीड़ा सिर्फ उसकी ---

--------परन्तु उसके सुख सब के लिये

लोग चाहे कुछ भी कहें पर कुछ नहीं बदला

स्त्री चाहे गांव कस्बे की हो अथवा महानगर की

एक जगह आकर सब एक सी ही हैं

अपने सुख अपने लिए सोचा मात्र भी उन्होंने -----

प्रतिबन्ध और वर्जनाओं की एक मजबूत दीवार

आज भी खड़ी कर दी जाती है उसके चारों ओर ------

विडम्बना तो यही है यह सारे नियम वो निर्धारित करते है

जिनके मुख पर न जाने कितने मुखौटे होते है

प्रयत्क्ष रूप से जो प्रतिबन्ध का समर्थन करते है मुखौटा ओढ़ कर

वो ही परोक्ष में इसे तोड़ते भी है अपने असली स्वरूप में

कितना दोगला स्वरूप है इस समाज का और इनके रिश्तों का

दिन के उजालों में जहां रिश्तो और कर्तव्यों के

बड़े बड़े भारी भरकम पाठ पढाये जाते है

-- हरे ,पीले ,सफेद वस्त्रों की आड़ में धर्म भीरुता का

घुट्टी कर्तव्य के रूप में मन मस्तिक्ष्य में कूट कूट के

भर दी जाती है ----कर्तव्य बोध की लम्बी चौड़ी दास्तान

उदाहरण सहित सुनाई जाती है ---दूसरी तरफ वहीँ

-रात के अंधेरों में रिश्ते लुटते है शर्मसार होते है

कर्तव्य बोध कहीं विलुप्त हो जाते है पाप हावी हो जाता है

रात की काली चादर में --झक सफ़ेद वस्त्र दागदार होते हैं

धर्म चीखता है और उसके ठेकेदार अट्टहास करते हैं

--रिश्ते शर्मसार होते हैं ----कितनी विडंबना है --

किन्तु विरोध के स्वर यदाकदा ही मुखरित कर होते है

और फिर तीर की तरह चुभती पैनी निगाहें

व्यंग के वार से छलनी अंतरात्मा लिए एक स्त्री ही

भटकती फिरतीं है जीवन की पगडंडियों पे -

यही एक प्रश्न लिए अपनी पनीली आँखों में

तुम ही बताओ समाज के ठेकेदारों उत्तर दो

क्या स्त्री सिर्फ एक देह है बोलो ?

या इससे इतर भी कुछ है उसका अस्तित्व ?

इस यक्ष प्रश्न का उत्तर कौन देगा

मनु की सतरूपा /आदम की हव्वा /एडम की ईव

ये सब भटक रहीं है ओढ़े हुये

इन सफ़ेद ,पीले ,हरे रंगों के कफन

और जवाब मांग रहीं हैं समाज और

रंगो के इन ठेकेदारों से --

क्या स्त्री देह के इतर कुछ भी नहीं ?

-----Divya Shukla--------

2-10-2013

पेंटिंग गूगल से