Thursday, 28 November 2013

छाप की पाँवों की धूमिल सी

छाप की पाँवों की धूमिल सी
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पत्थरों के इस महल में

कुछ आलता रंगे क़दमों

के धूमिल से निशान दिखे

बरसो पहले नवाँकुरित सपनों को

आँचल में सहेजे गृह प्रवेश करती

किशोरी नवबधू के भीतर आते

पाँवों की छाप थी धूमिल भी थी

और चटक भी लगती कभी

अरे बस एक हाथ की दूरी पर

बाहर की ओर जाते क़दमों के

निशान सुर्ख़ लाल चटक से

किसके है ? ध्यान से देखो

पत्थर की गूँगी बहरी

दीवारों की दरारों में

अपनी उम्र के सारे बसंत भर

पतझर लिये इस ऊँची ड्योढ़ी

को लाँघ कर बाहर जाती हुई

उसी किशोरी के तलवों से

रिसते हु़ये रक्त की छाप है

---- Divya Shukla-----

26.11.2013

पेंटिग गूगल से

Friday, 8 November 2013

बर्फ के फूल !!




बर्फ के फूल
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जिस्म से लिपटती हुई गहरी स्लेटी शाम

मेरे माथे की सुर्ख लाल बिंदी सा सूरज

पेड़ की सबसे ऊँची फुनगी पर लटका

विदा कह ओट में छुपता जा रहा था

जाते हुये सूरज से चुराई एक किरन

धागे की तरह लपेट लिया उसे अपनी तर्जनी में

रात के सारे काले डोरों से मैने ढेर सारे गोले बना लिए

दिन रात के करघे में बुनती रही अपना दुशाला

पलछिन बीतते गये तमाम उम्र गुज़र गई -

आखिर आज ओढ़ ही ली रात की काली सियाह चादर

और ऊँगली में अभी लिपटी है किरन सूरज से चुराई हुई

उसे लगा ही नहीं पाई कहीं नहीं टांका बस लिपटी रही तर्जनी में

आईने में खुद को देखा वक्त ने टांक दी है चंद लकीरें

तुम ने तो बहुत कोशिश की वक्त की सलवटों को

अपने गर्म हथेलियों से समेटने की पर कहाँ हटा पाए

पता है तुम्हारी हर छुअन से टंक गये कुछ फूल

रात की चादर पर ---जो सुबह बर्फ के फूलों जैसे थे

मेरे सर्द वजूद से लिपटी यह चादर भी जम गई है

और उस पर टंक गये है कुछ सफ़ेद सुंदर पारदर्शी फूल

सुनो --मैने उस पर एक अंजुरी सुर्ख लाल आलता भी छिड़का था

भला काली रात पर भी कोई रंग चढता है नहीं न ?

तुम तो जानते ही हो न ----

सुबह यह बर्फ के फूल महक रहे थे भीनी भीनी सुगंध फैली थी

उफ़ क्या तुम नहीं जानते यह कितना भी महकें पर

रहेंगे बर्फ के ही फूल न ----

-------Divya Shukla--------

9-11-2013

पेंटिग गूगल से साभार

Tuesday, 5 November 2013

कुछ दोराहे ऐसे भी !!



कुछ दोराहे ऐसे भी !!

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आईने के सामने न जाने कब से खड़ी

पर अपना चेहरा नहीं देख रही थी

अपनी ही आँखों में झलकता

वो अनदेखा चेहरा खोज रही थी

जो मुझ में ही कहीं गडमड हो गया है

जिंदगी की राह में मोड तो बहुत से आये

पर कुछ दोराहे ऐसे भी थे ---

कुछ अजीब असमंजस में पड़ी

जहां कुछ पल को ठिठक गई मै

किधर जाऊं कड़ी धूप चुनूँ या फिर

घुटने टेक कर ठंडी छाँव वाला रास्ता

जिंदगी तो सहल हो जाती पर---

जमीर के साथ साँसे भी गिरवी रखनी पड़ती

दूसरा रास्ता गुजरता हर पल जीवन की

कठोर परीक्षा कड़ी धूप और

राह में बिछे नागफनी के कांटो के बीच से

मैने दो पल लिए निर्णय लेने में --

चंद शब्द और एक ठोकर से

बंद कर दिया पहला रास्ता और

वो देखा हुआ चेहरा जो कभी

जाना पहचाना था उसका अक्स ही

निकाल फेंका एक गहरी सुकून भरी सांस ली ----

और फिर चल पड़ी स्वयं की चुनी राह पर ----

--साथ में था वो अनदेखा चेहरा

जो मेरा संबल था --कठिन राह में

जिसकी प्रतीक्षा मुझे जन्मो तक रहेगी

मुझे भी नहीं पता वो कौन है ---

मेरी ही कल्पनाओ में बसा वो अनदेखा वजूद

कभी कभी सोचती हूँ --कैसा अजीब शख्स है

जो है भी और नहीं भी ---------

पर जिंदगी गुजारने के लिए बस इतना ही बहुत है

न जाने किसका ये शेर याद आता है --

जब भी सोचती हूँ मै --

(वो ख्वाब बन के मेरे चश्मेतर में रहता है

अजीब शख्स है पानी के घर में रहता है )

है न अजीब सी बात ---इसी लिए तो कहती हूँ

मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की ----

-------Divya Shukla--------

पेंटिग गूगल से साभार —