Monday, 15 December 2014

जानते हो न मीता -



जानते हो न मीता
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तुम जानते तो हो ही न मीता तुम्हे क्या बताना

---------जाड़े की गुनगुनी दोपहर चहकती गुनगुनाती हैं

तो शामे एक गहरी उदासी से भरने लगती है --------

------------रात गहराती है और अवसाद से भर जाती है

सिमट जाती है अपने ही खोल में --याद आने लगता है ------

सब कुछ तुम्हारे साथ गुज़रा वो वक्त --जो कहा वो भी और जो न कहा वो भी

ऐसी ही ठंड में बोरसी की आग में लकड़ियाँ जला कर तापना

आलू और शकरकंद गर्म राख में दबा -उसे उलटना पलटना उफ़

और हरी धनिया मिर्च वाले नमक के साथ मूंगफली खाना --

अरे हाँ तुम्हारी नानस्टाप बकबक भी तो सुनना -अरे ठीक है मेरी बकबक सही

सुनो मीता मैने कितनी बार तुमसे कहा हम कितने भी अच्छे दोस्त हो

पर ये दुनिया इतनी अच्छी नहीं जो हमारा मन पढ़ सके ----

कच्चे सूत के धागे से बंधा है हमारा मन हमारा रिश्ता हमारी दोस्ती

तुम कितनी ही दूर रहो इसी धागे से जुड़े हो ---अच्छा एक बात कहूँ

मुझे अपने घर में नौकरी दे दो न --क्या कहा मुझे काम करना नहीं आता

अरे हंस क्यों रहे हो .....मजाक उड़ा रहे हो मेरा

जाओ नहीं बोलती मै तुमसे .....अच्छा हुआ तुम मेरे पल्ले नहीं पड़े

तुम से तो कभी नहीं बनती मेरी ......हद्द हो गई अब तो ---लेकिन क्या करूँ

अब मै तुम्हारे बगैर रह भी तो नहीं पाती ...तुम भी तो नहीं रह पाते

एक बात बताओ क्यूँ नहीं साथ रह सकते हम --क्या दो दोस्त साथ नहीं रह सकते

अब तो सांझ हो चली है जीवन की -- साँझ के धुधलके में ही तो सहारा चाहिए न ?

तुम मेरे पास नहीं हो जानती हूँ कभी होगे भी नहीं यह भी जानती हूँ

पर सोच तो सकती हूँ ----पता नहीं कौन सी भूल हुई हम दोनों से

अच्छा एक बात बताओ मीता कहीं हिरामन की तरह तुम भी डरते तो नहीं

बिगड़ते काहे हो अरे महुआ घटवारिन से होगी कोई तुम्हारी भी --

कही तुमने भी तो ये तीसरी कसम तो नहीं खाई -(अब भूल जाऊंगा तुम्हे )

अर्ररर नहीं कहूँगी न तंग करुँगी तुम्हे ,लेकिन पहले वचन दो मुझे उस उपरवाले से

जरुर झगड़ेंगे दोनों मिल कर --- जीवन के पथ पर मीत क्यों मिलाये

और मिलाये तो दूर क्यों कर दिया ---

--------दिव्या शुक्ला !!

Tuesday, 9 December 2014

अब कोई अहल्या पाषाण नहीं बनेगी



अब कोई  अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

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पत्थर तो हूँ पर अहल्या  नहीं

फिर राम तुम भी तो नहीं

नहीं चाहिये तुम्हारा स्पर्श

इस पत्थर में स्पंदन भरने को

अगर असंभव को संभव कर सको

इस पाषाण ह्रदय पर  अंकित करो

कुछ कोमल अभिव्यक्तियाँ

पर नहीं कहाँ कर सकोगे

पुरुषोचित अहम तुम्हारा दम्भ

बार बार रोकेगा तुम्हे

तुम या तो छलना जानते हो

किसी अहल्या  को छदम रूप धर

और उसी को सांत्वना नहीं

पाषाण बना देते हो अपने व्यंग बाणों से

पति के रूप में ---धिक् है तुम पर

अपने अहंकार के वशीभूत हो

अरे तुम उस इंद्र को दंड दे सकते थे

जिसने सतीत्व भंग किया छल से

छली गई नारी तो स्वयं आहत है

नहीं बदला अभी भी कुछ

आज छल बल दोनों है --

इंद्र का प्रतीक कामांध पुरुष

एवं गौतम ऋषि के प्रतीक पति

पर नहीं है तो वो अहल्या  जो

उस युग में पाषाण बनी पड़ी रही

युगों तक मार्ग में अविचल

सिर्फ एक स्पर्श के लिए

किसी इंद्र के प्रतीक में नहीं है

अब इतना साहस छल सके

न ही किसी के छुद्र अहंकार में

इतनी शक्ति वो तिरस्कृत करे

यह शरीर मंदिर है नारी का

और मंदिर परम पवित्र होता है

इसमें वास करने वाली आत्मा

शक्ति और आत्मविश्वास से पूर्ण होती है

अब कोई अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

तुम्हे बदलना होगा अब ----

इस कलयुग के इंद्र --और गौतम

--------दिव्या शुक्ला  !!

पेंटिग गूगल से साभार

Sunday, 12 October 2014

हरसिंगार के ये उजले फूल



हरसिंगार के ये उजले फूल

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भोर में हर रोज़ ही ये केसरी डंडी वाले

छोटे छोटे उजले हरसिंगार के फूल

ओस से नहा कर हरी दूब के कालीन पर

जब अपनी भीनी भीनी सुगंध लिए

टप टप गिर कर बिछते हैं

लेट कर न जाने कितनी देर --

मै उन्हें अंजुरी में रोपती रहती हूँ

हरसिंगार धीमे धीमे बरसता रहता है

ओढ़ना चाहता है मानो मुझे

श्वेत धवल महकती चादर

सुनो ! जानते हो तुम ?

इन्हें छू कर क्या चाह सी उठती है मन में

काश एक हरसिंगार तुम रोप दो मेरे मन में भी

जिसके फूल मेरी इन आँखों से झरें

और तुम अंजुरी में रोप लो उन्हें --
-----दिव्या शुक्ला -!!

Saturday, 4 October 2014

सुनो ऐ नरम दिल लड़कियों !!

सुनो ऐ नरम दिल लड़कियों

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रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों

जरा सा सख्त भी हो जाओ --वरना

खतम हो जाएगा तुम्हारा वज़ूद

इसी तरह दोयम दर्जे का जीवन जीती रहोगी

याद करो कभी अपने ही घर में सुना होगा न

किसी को बार बार यह कहते

अपनी इज्जत करना सीखो --

जो अपनी इज्जत नहीं करता

दुनिया उसकी परवाह नहीं करती

सुनो ऐ नरम दिल बेवकूफ लड़कियों

कितनी भोली हो तुम नहीं समझी न ?

यह शब्द यह नसीहत यह सीख कुछ भी

तुम्हारे लिए नहीं थी अरे यह सब

तुम्हारे भाइयों के लिए कहा था

भले ही कहने वाली तुम्हारी माँ ही होगी

तुम्हारी नियति तो तय ही कर दी गई थी

सदियों पहले -- वो ही दोयम दर्जे वाली

सब जानते थे आज भी उन्हें पता है

रुई हल्की सी नमी से भीग जाती है

भारी बोझिल हो जाती है ---आंसुओं से

पर वो यह कैसे भूल गए ---कभी कभी

हल्की सी चिंगारी से रुई में आग भड़क जाती है

और भस्म हो जाता है पूरा का पूरा साम्राज्य

उसी रुई से तो बना है तुम्हारा नरम दिल

पर सुनो क्यों नहीं समझती तुम

जब तक तुम खुद नहीं समझोगी

कैसे समझाओगी सबको ----

अब तो समझो ---मत बहो अंधी नदी की धार में

जिसके कगार ढह रहे हों न जाने किस खाड़ी में

ले जाकर पटक देगी तुम्हे और फिर होगा वही

अथाह सागर में विलीन हो जाओगी --

तुम्हे खुद बनाना है अपना बाँध एकजुट हो कर

तभी तो तुम्हारी उर्जा से दिपदिपायेगा --

जगमगायेगा पूरा समाज --और

फिर ऐ रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों

बस तनिक सा कठोर हो जाओ ---

अपना सम्मान करना सीख लो

--------दिव्या शुक्ला ---

पेंटिग गूगल से

Monday, 22 September 2014

माँ अब नहीं पहचानती मुझे -



माँ अब नहीं पहचानती मुझे

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माँ की चिट्ठी में अक्षर धुंधले हैं

वो कागज़ भी पीला पड गया है

माँ के चेहरे की तरह ,मेरी चिंता में

दो बूंद आंसुओ के निशान भी हैं

पर वो अभी भी नम है --

सुनो माँ तुम नहीं जानती

अब मै भी थक गई हूँ -

तुम्हारी गोद में सर रख कर सोना है मुझे

बहुत दिनों से गहरी नींद नहीं आई

तुम कब आओगी क्यों नहीं पहचानती मुझे

डाक्टर कहता है अल्जाइमर है -कुछ नहीं है तुम्हे

अभी पिछले ही हफ्ते तो की बात है इधर मै जाग रही थी

दो सौ किलोमीटर दूर तुम घबरा कर जाग गई -

ये कैसा महीन तार जुड़ा है माँ बेटी के बीच शायेद -

गर्भनाल महीन तंतु से जुड़ी है अभी भी कटी नहीं पूरी तरह

नहीं सोई कितनी ही रातों से मै जानती हो माँ

तुम जब आओगी तुम्हारे पास तुम्हारा हाथ थाम कर

मुझे सोना है गहरी नींद तुम्हारे कमज़ोर जिस्म से लिपट कर -

बाँध लेना है अपने पल्लू से तुम्हारा आंचल

तब तुम मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जा पाओगी

--------दिव्या शुक्ला !!

22-9-2014

चित्र गूगल से साभार

Monday, 15 September 2014

आखिर स्त्री का अपना घर कौन सा है ?



आखिर स्त्री का अपना घर कौन सा है ?
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न जाने क्यूं -----
बार बार ये प्रश्न गूंजता है मन में ----
स्त्री का अपना घर कौन सा है ???
मायका या ससुराल ????
सोचो आज अगर पिता से
लड़की अपना घर मांग ले तो ?
उसका मायका छूट जायेगा न
खून के रिश्ते अगर बेरहम नहीं होंगे ----
फिर भी खटास तो आ ही जायेगी ----
किसी स्त्री का अपना घर कहाँ होता है ----
पिता का घर ----पति का घर ---बेटे का घर --
परजीवी हुई न -----और क्या नाम दूँ ---
हँसी आती है कभी कभी यह सोच कर
स्त्री की न कोई जाति है न धर्म
वो सब पुरुष का दिया -------------
कहीं देवी बना दिया कहीं दासी
कहीं कुलीन परिवार के ऐश्वर्य में
मिस्र की ममी की भांति सज्जित हो
उनके गुण दोष छुपा कर घुट घुट कर मरती है
तो कोई दासी बन कर खटती है -----
आध्यात्म या आत्महत्या -------
दोनों ही एक सहज साधन है
इन से मुक्ति का और कोई रास्ता नहीं
अगर ये रास्ता नहीं अपनाया फिर --------
तो यही से शुरू होता है उसका संघर्ष --------
सच ही तो कहा मैने ----------------------
स्त्री परिवार की इज्जत कहलाती है
पर परिवार पुरुष का ही कहलाता है
कर्तव्य तो है उसके पर अधिकार नहीं
बहुत से ऐसे पति पत्नी भी होते है
प्रेम नहीं है आपस में पर -----
रिश्ते निभाने है ----------
पर बिना प्रेम के रिश्ते क्या होते है
मुझे समझ में नहीं आता
इनको क्या कहते है ----------------
कोई बता सकता है क्या ??--------
मुझे तो लगता है मन का सब खेल है
मन मिला तो मेला -----
वरना सब से भला अकेला ----
अगर प्रेम भी नहीं तो क्या रह गया फिर ----
माना तुम आसमान हो ------------------
तो हम भी जमीन है --------------
दोनों ही एक दूसरे के बगैर अधूरे ---------
फिर तुम्हारा अहम क्यों आड़े आता है ------
अगर सीमा रेखायें स्वार्थ और अधिकार के लिये खींची हो -------
तो उनके पार क्या जाना पाप है ?
-------दिव्या शुक्ला ----


Tuesday, 19 August 2014

पीड़ा-से आद्र अनुभूति !!

पीड़ा-से आद्र अनुभूति
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एकांत के अंधेरों में 

पीड़ाओं के विलाप 

पलकों से पसीजे 

भोर में भैरवी की धुन


पर थिरक गई अधरों

पर मुस्कान --

विडम्बनाओं के

झूले में धूप छाँव सा

झूलता मन

मंद गति से

खिसकता जीवन

जब अपनी ही परछाईं

को पकड़ने का निरर्थक

प्रयास में लगा रहता

तब झाँक जाता है

अट्टहास में छुपा विलाप

-----दिव्या शुक्ला !!

पेंटिग गूगल से 

Thursday, 14 August 2014

देवियाँ बोला नहीं करती --

देवियाँ बोला नहीं करती --

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जब भी स्त्री जीवन की

काली अँधेरी राहों से

बाहर आना चाहती है

नई राह खोजती है

रोशनी की नन्ही किरण के लिये

बस --हंगामा हो जाता है

देवी को महिमामंडित

सिंहासन से उतार फेंकते हैं

पवित्र ---अपवित्र ---दो शब्द

बेध कर रख देते ---

स्त्री के हर्दय को

यही दो शब्द थे ---जिसने

अहिल्या को पत्थर बनाया

क्यूं नहीं समझते ----

--हमारी मर्यादा हमारा सम्मान

हमारे अपने लिये है -------

--विवाह स्वर्ग में बना जन्मो का बंधन नहीं

मन का बंधन हैं ---प्रेम का बंधन हैं ---

नहीं स्वीकार है वस्तु बनाना -----

- -धुर्वस्वामिनी धन्य है

कायर पति द्वारा शकराज को उपहार में

दिये जाने का प्रतिकार --------

प्रतिकूल परस्तिथियों में सहनशक्ति की पराकाष्ठा

अंत मे एक चीत्कार -----एक प्रश्न -----

--आखिर ये निर्णय होना ही चाहिये -----

मै कौन हूं --क्या एक वस्तु ?? ----

--कायर पति का परित्याग --

--विवाहित जीवन की मर्यादा का कठोरतम पालन

स्वतंत्र होने के पश्चात चन्द्रगुप्त का वरण ---

क्या प्रसाद की धुर्वस्वामिनी आदर्श नारी नहीं

अगर है तो उसका उदाहरण क्यूं नहीं ?

काश कि हर धुर्वस्वामिनी को चंद्रगुप्त मिले -----

माना की मौन सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो सकता है

पर वह स्वतंत्र सक्षम मौन ---

----लाचार असमर्थ दयनीय मौन नहीं ----

तुम्हें पता नहीं ऐसा मौन जब टूटता है

संबंध दरक जाते है ---नीवें हिल जाती है

इसीलिए तो कहा न ---हमें सुनो समझो

हमारा मन तो पढ़ो ----खुल कर जीने दो

हमारी इच्छा अनिच्छा का भी मतलब समझो

जिसे प्रेम करते है उसे जी भर याद तो कर सके

काल्पनिक जगत में विचरने में भी पाबंदी

कलम चली अगर हमारी ---तो कितनी भृकुटियां टेड़ी

आखिर क्यूं ---मत करो ऐसा --समझो सोचो --

अभी तो अस्तित्व को बचाने को जूझ रही है नारी

ये समय है कोख में समाप्त होता अस्तित्व बचाने का

आने वाला समय व्यक्तित्व का ---

अस्तित्व --व्यक्तित्व ---और हम --

आने वाला समय हमारा ही होगा

---------दिव्या शुक्ला ----

पेंटिग गूगल से

Friday, 1 August 2014

सुनो सुधर जाओ अब तो हमें शर्मिंदा न करो !!

सुनो सुधर जाओ अब तो  हमें शर्मिंदा न करो

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इन दोनों मन बहुत विचलित रहा

एक अजीब सी उदासी घेरे हैं

नींद मानो बैर ठाने है

आखिर थक कर पलकें झपक जाती है

फिर वही ख्वाब जो बार बार दीखता है

कोई मेरे हाथों से कलम छीनता है

और कहता है मै तेरी किस्मत लिखूंगा

मै मुकद्दर का फ़रिश्ता हूँ --

उसके सामने से कागज़ की पोथी छीन

चीख उठी मै नहीं अब नहीं -

तेरा लिखा बहुत भुगता मैने

अब खुद अपनी तकदीर मै ही लिखूंगी

और झटके से नींद टूट जाती है -----

हम औरतें मिटटी की तो बनी होती हैं

वो गीली गुंधी मिटटी जो हर रूप में ढल जाती है

हमारे ही बदन की मिटटी से बनते है

कुछ नन्हे खिलौने कुछ नन्हे फ़रिश्ते

जिनमे से कुछ बड़े हो कर -----

हमारी ही इस्मत से खेलते हैं

मिटटी में मिला देते है हमारी मोहब्बत भरी परवरिश

पर नहीं अब नहीं हमने ही बिगाड़ा है तुमको

कैसे मर्द बने तुम एक दुसरे से झगड़ते भी हो तो क्रोध में

अपशब्दों में अपनी ही माँ बहनों को याद करते हो

सुनो अब भी समय है सुधर जाओ वरना कहीं ऐसा न हो

बेटों की माँ कहलाने में हम शर्मिंदा हों !!

-----------दिव्या शुक्ला ----------

चित्र  गूगल  से  साभार

Sunday, 29 June 2014

जाओ तुम भी ना

जाओ तुम भी ना

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थाम कर मेरी हथेली

न जाने किस रौ में उस शाम

अनगिनत शब्द उकेरे थे तुमने

न जाने कितनी बार

लिखा तर्जनी के पोरों से

अपना ही नाम -

मानो मेरी भाग्यरेखाओं से

खुद को बांध रहे हो --

खिलखिला कर हंस रही थी मै

गोल गोल बड़ी बड़ी आँखों से घूरा

तुमने खीझ कर मुझे -और मै ?

मै तो उस पल मौन हो गई मुस्कान दबा कर

आज न क्यूँ फिर याद आये वो पल

देर तक देखती रही अपने दोनों हाथो को

वो अक्षर ढूंढ रही थी -वो यही थे अभी तक

पसीजी हुई हथेलियों से अपना ही मुख ढांप लिया

सुनो देखो तो सारे शब्द उभर आये - मेरे चेहरे पर

अरे तुम कहाँ हो - कहाँ खो गए हो --

क्या कहीं और उकेर रहे हो यही शब्द -

उफ़ तुमसे ये उम्मीद न थी

--------- दिव्या शुक्ला ---------

30 -6-2014

पेंटिग गूगल से

Monday, 23 June 2014

आग सा दहकता है ये मुजस्सिम: --

आग सा दहकता है ये मुजस्सिम:
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सोने सा बदन चांदी की नज़र --

फुल वाल्यूम में तुम्हारी आवाज़ गूंज रही - और मै 

उफ़ पक गए कान सर भारी हो गया सुनते सुनते

अब तो खीझ होने लगी है रफ़ी के इन बोलों से

तुम नहीं जानते कैसे ये एक आम सी लड़की जो

रोज रोज सूरज से धूप चुराती और बदन पर मलती

शायेद उसका बदन भी सुनहरा हो जाए ---

और इसी से चकाचौंध हो जायें तुम्हारी आवारा निगाहें

अटक कर रह जायें बस यही तक -- तुम्हारी थी फिर भी

कैसी मासूम सी ख्वाहिश कितनी बेवकूफी भरी कोशिश थी तुम्हे बाँधने की

तुम तो हर आंचल से टकराते आवारा झोंके हो

भूल ही गई थी भला कैसे रुक सकते थे एक ही आंचल में

आहिस्ता आहिस्ता तब्दील हो गई पूरी तरह से

पत्थर की हवेली में घूमते सोने की जीती जागती प्रतिमा में

लकदक करती सुनहरी धूल और जरी के कफन में लिपटी

पर दो बोलती आँखे उनकी नमी सूख गई पथरा गई जानते हो

एक नरम खरगोश सा नाज़ुक दिल कछुए की पीठ सा कठोर हुआ पता ही न चला

सुनो तुम क्या जानो तुम्हे पाने की चाहत में कितना कुछ खोया

पर जब भी तुम्हारे वक्ष पर सर रखा बड़ा कोलाहल था वहां

अचानक एक झटके लौट आई वो --नहीं यह मेरी जगह नहीं -

नहीं कभी नहीं यह तो मुसाफिर खाना है और मुझे अपना घर चाहिए सिर्फ अपना

टूट गया भरम और बिखर गया तिनके सा ख्याली घरौंदा ---

चुनी एक नई राह जिसका कोई भी सिरा तुम तक नहीं पहुँचता

अब कैसे जीना है धूप से नहाना है -या टूटे नारियल के कटोरे में चांदनी पीनी है

यह तो अब मुझे ही करना है किसी और के लिये नहीं बस अपने लिए

जानते हो अब यह मुजस्सिम: तुम्हारी राह नहीं देखता

धूप में चमकता है भटकता है जानते हो अब यह तपता भी है --

अब चौंधिया जायेंगी तुम्हारी आँखे पर हाथ जल जायेंगे

क्यूँ की अब आग सा दहकता है यह मुजस्सिम :

----------दिव्या शुक्ला ------

मुजस्सिम: -- प्रतिमा -मूर्ति

24-6-2014

पेंटिग  गूगल  से  साभार 

Friday, 30 May 2014

चलो मातम मनाये इस मर्दवाद पर --

चलो मातम मनाये इस मर्दवाद पर

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भीड़ का कोलाहल भयभीत औरत हां सब औरतें ही है

पहले नन्ही बच्चियां थी अब कहाँ रह गई सब बदल गई

औरतों के जिस्म में / वह जिस्म जो उनका मंदिर है पर

अब कहाँ वह तो एक कूड़ेदान हो गया टटोलते है जिसे गीदड

अपनी आदिम भूख मिटाने को ---सिर्फ औरत का जिस्म ही है

जो गोश्त के ढेर में बदल गया यहाँ चारों ओर पैने दांतों वाले आदमखोर घूम रहे

बघनखे पहने तलाशते है गर्म गोश्त / लहू पीते है नरम गर्दनो में दांत गड़ा के

सुनो रेशम सी बेटियों ओढ़ लो अपना खोल छुपा लो अपना वजूद

कोई हक नहीं खिलखिलाने तुम्हे झरनों की तरह बहने का /

समेट लो अपने पंख उतर आओ अपने आकाश से यह मुक्त गगन नहीं रहा तुम्हारा

यहाँ गिद्ध उड़ रहे है / दबोच लेंगे अपने मजबूत पंजो में नोच खायेंगे तुम्हारा जिस्म

तुम तो खूंटे की गईया थी रहोगी भी जहाँ हांक दिया वही जाना है दूसरे खूंटे में बधने

नहीं देखना सपने / झुठला दो सब बंद कर लो आँखे तुम को अब अपने को बचाना है /

पत्तल सकोरे कुल्ल्हड़ ही तो हो तुम जिसमे खाया और फेंक दिया /साबित किया

वह पुरुष है / चलो हम सब मिल मातम मनाएं मनुष्य की अंतरात्मा की मृत्यु पर

और छोभ व्यक्त करे मर्दवाद के जिंदा होने पर

-----------------दिव्या शुक्ला -----------

31-5-2014

चित्र गूगल से साभार

Sunday, 25 May 2014

यशोधरायें वही रहेंगी --और उनके प्रश्न भी

यशोधरायें वही रहेंगी  

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यशोधरा तुम उपेक्षित हुई हो महान नहीं

तुम्हे तो आवरण ओढाया गया महानता का

क्यूँ नहीं किया प्रतिरोध तुमने -

नहीं तुम कैसे करती तुम्हे ज्ञात ही कब था

विश्वासघात ही तो हुआ था तुमसे - अनिभिग्य थी तुम

सिद्धार्थ में तो इतना भी साहस नहीं था

वह तुम्हे बता कर तो जाते

कैसे मिला सकते थे दृष्टि

तुम्हारे नेत्रों में तैरते प्रश्नों का

कोई उत्तर भी तो न था उनके पास

रात्री के अन्धकार में सोई पत्नी को छोड़ कर

दबे पाँव निकल कर विवाहित जीवन से

पलायन करने वाला पुरुष

भगवान कहलाया पूज्य हुआ पूजित ही रहेगा

युगों से एवं आने वाले अनेक युगों तक

परंतु संपूर्ण जीवन विरह के तपते मरुस्थल में

भटकती नारी तुम्हे क्या मिला ?

त्याज पत्नी उपेक्षिता और पीड़ा का दंश ?

कभी कभार याद किया जाता है तुमको भी

पर उसमे भी सिद्धार्थ ही महान कहलाते है

अपनी युवा सुंदरी विवाहिता धर्मपत्नी को त्याग

कितना महान कार्य किया युवराज ने !

सुनो - तथागत यदि तुम्हे यही निर्णय लेना था

तो वरण क्यों किया यशोधरा का ? बता कर तो जाते

तो कदाचित संपूर्ण जीवन पीड़ा का वृश्चिकदंश न चुभता

विरहणी यशोधरा के सूखे अधर तीनों प्रहर यह न दोहराते

सखी वो कह कर तो जाते - आह सखी वो कुछ तो कह जाते

महान तथागत तुम भले ही भगवान बुद्ध कहलाओ परंतु

सुनो सिद्धार्थ तुम रहोगे यशोधरा के अपराधी ही --

यद्यपि संसार को तुमने अहिसा के तमाम मार्ग दिखाए -

पत्नी के साथ यह हिंसा ही तो की तुमने

संपूर्ण जीवन विवाहिता होते हुए भी पति विहीन रही

ये कैसा आदर्श रखा तुमने संसार के समक्ष -

आज भी कहीं कोई यशोधरा मौन मूक क्रन्दन करती है

महान बना दी जाती है वह बिना उसकी वेदना को समझे ही

उसकी संपूर्ण पीड़ा को त्याग में बदल दिया जाता है

भला कब कोई यशोधरा सिद्धार्थ से विलग हो पल भी भी जी पाई है

समय बदला है यशोधरायें आज भी वही है

उनके नम नेत्रों में तैरते प्रश्न भी वही

ज्ञात तो कराते --मेरा अपराध क्या था

युग बीतते जायेंगे सिद्धार्थ बदलते जायेंगे

किंतु यशोधरायें वही रहेंगी --और उनके प्रश्न भी

इनके मौन इनके त्याग इनके युवा स्वप्नों के दहन से ही

कोई राजकुमार भगवान बुद्ध की अवस्था को प्राप्त हुआ

तो आज कोई साधारण पुरुष अपने जीवन की

चिरप्रतीक्षित लालसाओं को पूर्ण करने में समर्थ हुआ

खोया तो केवल नारी ने --

--------- दिव्या शुक्ला -------------

26-5-2014

चित्र गूगल  से  साभार 

Saturday, 17 May 2014

प्रतीक्षा --

प्रतीक्षा

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धुंधली दृष्टि धनुही सी कमर

संकरी तंग गलियों में रोज

ढूंढती फिरती है अपनी ही

आयु का खोया दस्तावेज़

कोसती है मृत्यु को

सब ने बिसारा पर

वो काहे उसे बिसर गई

-----दिव्या शुक्ला !!

17-5-2014

चित्र गूगल से

Sunday, 4 May 2014

बुझ गये सांझे चूल्हे खो गई मिट्टी की महक

बुझ गये सांझे चूल्हे खो गई मिट्टी की महक

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कहाँ खो गया वो मिटटी का घर

तालाब की पिडोरी मिटटी और गोबर से

लीपा हुआ अंगना / दलान और दुआर ओसार

रातों में गमकती महुआ की मादक सुगंध

नीम की ठंडी छाँव निम्बौली की महक

आम की बगिया जामुन का लदा पेड़

चूल्हे में सेंकी आजी के हाथ की खरी मोटी रोटी

पतीली में बनी आम की खटाई वाली दाल

हरे चने मटर का निमोना जिसमे अम्मा के हाथ की बडियां पड़ी रहती

भोर में मथनी से मट्ठा बनाती अम्मा कितनी सुंदर लगती

हाथ से मक्खन निकालते जब उनके चूड़ी भरे हाथ सन जाते

पीपल बरगद की छाँव तले वाला इनारा (कूआं)

आंचल से मुँह ढंके गाँव की नई नवेली भौजाइंया

तर्जनी और मध्यमा ऊँगली से पल्ला थाम

आँखों से इशारे करती अपने उन को और

झुक जाती शर्म से पलकें देवरों से नजर मिलते ही

ननद भाभी की चुहलबाजी देवरों की ठिठोली से

गूंजता अंगना बीच बीच में अम्मा बाबू की मीठी झिडकी से

कुछ पल को ठहर जाता सन्नाटा -कहाँ गया यह सब

शायेद  ईंट के मकान निगल गये मिटटी का सोंधापन

गोबर मिटटी से लीपा आंगन कही खो गया ढह गया दालान

फिनायल और फ्लोर क्लीनर से पोछा लगी लाबी में बदल गया ओसारा

भाँय भाँय करने लगा अब बड़ा आंगन अब तो पिछवारे वाली

गाय बैल भैंस की सरिया भी ढह गई अब कोई नहीं यहाँ

भाइयों के चूल्हे बंट गए और देवर भाभी के रिश्ते की सहज मिठास में  भी

गुड़ चीनी की जगह ले ली शुगर फ्री ने / ननद का मायका औपचारिक हुआ

चुहलबाजी और अधिकार नहीं एक मुस्कान भर बची रहे यही काफी है

अम्मा बाबू जी अब नहीं डांटते कमाता बेटा है बहू मालकिन

अब पद परिवर्तन जो हो गया वो बस पीछे वाले कमरे तक सिमट कर रह गए

उनका भी बंटवारा साल में  महीनो के हिसाब से हो गया

छह बच्चों को आंचल में समेटने वाली माँ भारु हो गई

जिंदगी भर खट कर हर मांग पूरी करने वाले बाबू जी आउटडेटेड

अम्मा का कड़क कंठ अब मिमियाने लगा और बाबू जी का दहाड़ता स्वर मौन -

आखिर बुढापा अब इनके भरोसे है अशक्त शरीर कब तक खुद से ढो पायेंगे

दोनों में से एक तो कभी पहले जाएगा /अम्मा देर तक हाथ थामे रहती है बाबू का

और भारी मन से कहती है तुम्ही चले जाओ पहले नहीं तो तुम्हे कौन देखेगा

हम तो चार बोल सुन लेंगे फिर भी तुम्हारे बिना कहाँ जी पायेंगे

आ ही जायेंगे जल्दी ही तुम्हारे पीछे पीछे -भर्रा गया गला भीग गई आँखें

फिर मुंह घुमा कर आंचल से पोंछ लिया हर बरगदाही अमावस पूजते समय

भर मांग सिंदूर और एडी भर महावर चाव से लगाती चूड़ियों को सहेज कर पहनती

सुहागन मरने का असीस मांगती अम्मा आज अपना वैधव्य खुद चुन रहीं हैं -

कैसे छाती पर जांत का पत्थर रख कर बोली होंगी सोच कर कलेजा दरक जाता है -

उधर दूर खड़ी बड़ी बहू देख रही थी अम्मा बाबू का हाथ पकड़ सहला रही थी

शाम की चाय पर बड़े बेटे से बहू कह रही थी व्यंग्यात्मक स्वर में

तुम्हारे माँ बाप को बुढौती में रोमांस सूझता है अभी भी और बेटा मुस्करा दिया

पानी लेने जाती अम्मा के कान में यह बतकही पड़ गई वह तो पानी पानी हो गई

पर उनकी औलाद की आँख का पानी तो मर गया था ----

क्या ये नहीं जानते माँ बाप बीमारी से नहीं संतान की उपेक्षा से आहत हो

धीमे धीमे घुट कर मर जाते हैं फिर भी उन्हें बुरा भला नहीं कहते

सत्य तो यही है मिटटी जब दरकती है जड़ें हिल जाती है तब भूचाल आता है -

एक कसक सी उठती है मन में क्या अब भी बदलेगा यह सब

हमारी नई पीढ़ी सहेज पाएगी अपने संस्कार वापस आ पायेंगे क्या साँझा चूल्हे ?

---------------Divya shukla ------------

5-5-2014

पेंटिग गूगल से साभार

Tuesday, 22 April 2014

सुनो ! वैदेही कुछ तो बोलो -

सुनो ! वैदेही कुछ तो बोलो

--------------------------

न जाने कितनी मनौतियों मांगी देवी मईया से

बहुत अनुनय विनय की थी बाबा नें

तब कहीं जन्मी थी वैदेही ---दुनिया में आते ही -

बंदूकें दाग कर स्वागत हुआ था उसका

लोग जलभुन कर बोले भी --छठी मनाये हैं

मानो कुलदीपक जन्मा हो ---पराई अमानत है

इतना दुलार ---कभी कभी माँ झुझला भी जाती --

बोलती सुनो ! कहाँ ब्याहोगे इतना न बिगाड़ो दुलार से

बाबा ठठा कर हँसतें राजकुमारी है मेरी

उसे क्या जरूरत कुछ सीखने की ----

राजकुमार खुद से मांग कर ले जायेगा ---

---और हुआ भी यही ---एक दिन आया

बाबा बीमार हुये सबसे ज्यादा फिकर हुई

अपनी लाड़ली की तेरह चौदह साल की ही हुई थी

रिश्ता भी आ गया खुद चल कर ------

---घर वर दोनों ही मन मुताबिक ------

वैदेही का रघुवीर से नाता जुड ही गया

गुड़िया और सखियों के साथ गुट्टे खेलने की उम्र में

सात फेरे हुये ---वो बस यही सोच कर खुश थी

अब पता चलेगा माँ को ---बहुत डांटती थी न --

अब जाओ याद करो मुझे ---न गहने का मोह न कपड़ों का

ससुराल में माँ से भी प्यारी सासू माँ ---हर भूल छुपा लेती वो

पर जिसे समझना था वो तो समझ ही नहीं पाया ----

उसके लिये तो घर की तमाम कीमती चीजों की

तरह ही थी वो --बस एक कीमती समान

उसका बचपना मासूमियत सब गुम होती गई

वो चुप सी हो गई --आँखों में सूनापन भर गया

बाबा आते मिलने सीने से लगा कर प्यार करते

खूब रोती ---क्यूं भेजा इनके घर ले चलो वापस

कैसे बताती वो --क्या बताती ----

दो व्याघ्र जैसी आँखे हरपल उसके इर्दगिर्द घूमती रहती हैं

मौका मिलते ही दो पंजे उसे दबोचने को तैयार रहते हैं

कैसे बताती अपने जनक से ---उनकी वैदेही अपने ही घर में

असुरक्षित है अपनों से ही ---डरती है ---नींद में चौक जाती है --

नींद खुल जाती है किसी लिजलिजे से स्पर्श से

और एक साया तेजी से बाहर जाता दिखता है

वो साया जिसे वो पहचानती है --- बोल नहीं सकती

कौन सुनेगा उसकी यहाँ --वो भी नहीं

जिसने रक्षा के वचन भरे थे ----किंकर्तव्यविमूढ हो गई

कैसे बताती वो --बाबा तुमने कैसा वर ढूंढा --

जो प्यार नहीं पैसा पहचानता है -----

जो सब जान कर अनजान बना रहता है

----क्या बोले वैदेही ---यहाँ औरतों का बोलना मना है

क्या बताये ये विवाह एक समझौता है ---

बाबा तुम्हारे रुतबे से -----मौन रही वैदेही बरसों तक

लेकिन कब तक ---सब कहते सब पूछते

बोलो वैदेही कुछ तो बोलो मौन क्यूं कब तक ?

--बाबा की गीली आँखे पूछती चुप क्यूं हो वैदेही ? -----चुक गया धैर्य

चीख पड़ी ---फूट फूट कर रोई बाबा के सीने से लग

नहीं अब और नहीं ---इस बार नहीं दोहराई जायेगी प्रथा

और वैदेही नें ---रघुवीर का परित्याग कर दिया ---

शायेद यही नियति है ---हर युग में ---

बार बार यही गूंजता है मन में --

और कितने जनम लोगी वैदेही ----
-----
दूर कहीं कोई रामायण की चौपाई उच्चार रहा था

अनुज बधू भगनी सुत नारी

ये सब कन्या सम है चारी

इन्हें कुदृष्टि बिलोके जोई

---आगे की पंक्तियाँ

घंटे घड़ियाल में गुम होती गई -----

------------Divya Shukla ------

पेंटिग अज्ञात कलाकार की ---

Sunday, 20 April 2014

हम और तुम -ज्यूँ --नदी के ये तट

हम और तुम -ज्यूँ --नदी के ये तट

-----------------------------------

अपार जलराशि को समेटे हुये

-------तीव्र गति से बहती हुई

नदी को गवाक्ष से --------

----निहार रही थी मै -उस पार

चौड़े पाट को नदी के अपार विस्तार को ----

दुसरे तट को ---सोचती रही मै

------ये दोनों तट कभी नहीं मिलते

फिर भी कभी विलग भी तो नहीं -----

-----अंतिम छोर तक साथ रहते हैं

पर कभी स्पर्श भी न कर पाते -------

----एक दुसरे का -- बहुत निकट होते हुये भी

जब ग्रीष्म की ऊष्मा सोख लेती जल को----

-----कुछ पास से निहार लेते वो

मौन के सुखद संवाद हैं उनके पास----

---शब्दों के सेतु की क्या आवश्यकता

कुछ उसी तरह जैसे ----हम और तुम

----------न जाने कितनी बातें

तुमसे ---सिर्फ तुम्ही से --------

-----------मौन के माध्यम से

हमारे बीच शब्दों की ---------

---------आवश्यकता ही कहाँ

बिन कुछ बोले ही तुम -------

-------पढ़ लेते हो मन को मेरे

और मै तुम्हारे मौन को --------

-----------नदी के दो तट ही तो है

पर दूर कहाँ -----------

---------Divya Shukla ----

जनसत्ता 2013 दीपावली वार्षिकांक में छपी यह रचना

पेंटिग गूगल से साभार

Friday, 18 April 2014

तुम इतना भी नहीं समझते ?

तुम इतना भी नहीं समझते ?

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सुनो !आज न जाने क्यूँ

तुम बहुत याद आ रहे हो

तुम्हारे पास बैठ बस

तुम्हे निहारते रहने को

दिल कर रहा है

बिना बोले न जाने

कितनी बातें करनी हैं

तुम्हारी प्रतीक्षा में -

मेरी निगाहें रह रह के

दरवाज़े पे टहल आती हैं

हवा से भी जब सांकल बज उठती

तो बार बार तुम्हारे ही आने का

भरम न जाने क्यूँ होता है --

सोचती हूँ पता नहीं तुम्हे 

मेरी याद भी आती है या नहीं ?

पता है मुझे तुम यहाँ कहीं नहीं हो 

सुनो एक बात कहूँ शायेद 

तुम नहीं जानते तुमसे ज्यादा

तुम्हारे होने का अहसास प्रिय है 

मुझे --हैं न अजीब सी बात

देखो अब फिर कभी न कहना 

कि कहा नहीं मैने -तुम्हे तो पता है 

मै कह नहीं पाती हूँ कुछ --

अब कल की ही तो बात है

जब तुम ने कहा था ---

तुम्हे इश्क है मुझसे -

उफ़ पता भी है तुम्हे -----

इक जलतरंग सी बज उठी थी

बस ये सुन कर मन में ---

कान की लवें गर्म हो गई

पलकें अकेले में भी

लाज से झुक गई थी

फिर यही सवाल तुमने मुझसे भी पुछा 

नहीं बोल पाई मै कुछ भी ---

शब्द गले में अटक से गये 

जब की फोन पर थी --

तुम सामने भी तो नहीं थे --

अगर झूठ कहना होता तो

तो कह ही देती -नहीं है 

पर सच कैसे कह देती कि 

हाँ मुझे भी इश्क है तुम से

कितना मुश्किल है ये कहना उफ़

और तुम ना कितना हसें थे मुझ पर 

बिना कहे क्या नहीं समझ सके तुम

कितने खराब हो तुम -----

-------चलो हटो जाओ भी -- :) :)

---------Divya Shukla ------

चित्र  गूगल से साभार

Wednesday, 16 April 2014

एक टुकड़ा धूप का !!

एक टुकड़ा धूप का

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यादों की मुंडेर से

तांक झांक करती धूप

एक टुकड़ा धूप

खोजती फिरती

कोई सुगबुगाहट

अहसानमंद रहेंगे

अंधेरों के जिसने

छुपा लिये ज़ज़्बात

स्याह रात की आड़ मे

बालों को चेहरे पर

बिखेर कर ढंक दिया

भीगी पलकों को --

खुली खिड़की से आती

तेज हवा ने -----

मांगने लगी वो भी

इन आँखों की नमी --

कैसे दे दूँ इसे

सारे गिले शिकवे

इसमें ही बह जाते हैं

रोज़ सोने से पहले

जो तुम से करती हूँ मै

रह जाती है बस धूप

एक टुकड़ा धूप

सुनहरी यादों भरी

रोज़ हमें फिर से

मिलाने कोशिश करती

यादों की मुंडेरों से

रोज़ ही झांकती है

मेरे पास तो

जाती तो होगी

तुम तक भी

नहीं पहुँच पाई क्या ?

बंद खिड़की की झिरी से

एक किरन तो गई ही होगी

तुम्हारे पास -------

--और याद तो

तुम्हें भी होगी ही न

---- Divya Shukla -------

17-4-2014

चित्र गूगल से साभार

Monday, 14 April 2014

अनवरत सिलसिला --कशमकश का

अनवरत सिलसिला --कशमकश का 

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अतीत को कितनी ही गहरी कब्र में दफना दें 

मन पर वर्तमान की लगी हल्की सी भी ठेस से 

अतीत भयानक प्रेत की भांति सामने आ खड़ा होता

प्रतिशोध और घृणा और भी प्रबल हो उठती है प्रेत से 

आखिर वर्तमान से मिला दुःख का जिम्मेदार भी अतीत ही है न 

अब किसने गुनाह किये सज़ा किसने पाई 

यह कौन देखता है --पर प्रेत कैसे मरता है 

शायेद कभी नहीं --अंतरात्मा की गहरी अँधेरी खोह में 

दबा छुपा बैठा रहता है -- --अपनी हार का मातम मनाता 

वर्तमान की हल्की सी खरोंच से निकली 

एक दर्द भरी सिसकी से चौंक उठ जाता है 

और बलबला कर सामने आ खड़ा होता है देखते ही 

एक घृणा का सैलाब उमड़ता है नम आखों में 

और बरसते हैं तेजाबी आंसू जिसमे 

जला देने की तीव्र आकांशा --प्रतिशोध की वह भावना 

जो वर्तमान की चंद ठंडी फुहारों से बुझ सी रही थी 

लेकिन राख में भी चिनगारिया दबी रहती है 

उफ़ -----एक गहरी सांस ले वो बोलती रही 

और मौन हो मै सुनती रही महसूस करती रही 

उसकी अनकही पीड़ा -- जानती हूँ -उसका कोमल मन जो 

टुकड़ों में टूटता ही जाता बार बार --फिर जुड़ता है फिर टूटता है 

एक अनवरत चलने वाला सिलसिला -

कब तक आखिर कब तक ?

-------------Divya Shukla -------

15-4-2014

पेंटिग गूगल  से  साभार 

Saturday, 12 April 2014

कब तक चीखता रहेगा आधी आबादी का एक टुकड़ा

कब तक चीखता रहेगा आधी आबादी  का एक टुकड़ा

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ये नारी मन भी कितना विचित्र है

दुःख में सुख ढूंडता है -----

पीड़ा में प्रसन्नता खोजता है ---

अधिकतर दुःख वह खुद के लिए रख लेती है

और सुख बाँट देती है कभी

अपनों को कभी औरों को

पीहर में बेटी ससुराल में कुलबधू

जैसे भारीभरकम शब्द से सुशोभित

पिता की पगड़ी ससुर की सामाजिक प्रतिष्ठा

का टनों बोझ संभाले दबी जाती है वो बेचारी

उस पर भी अगर अकेली है

तो फिर तो कल्याण ही है

वो पढ़ा लिखा तबका हो या गाँव

हर जगह पति नाम का तमगा जरुरी है

वो चाहे नाम का ही हो --- बस है काफी है

और अगर नहीं है ये तो फिर

माँ से लेकर महरी तक उपदेश देंगी

वो पति परमेश्वर की माँ हो या खुद की

कहीं कभी यह भी हुआ और होता भी आ रहा है

जिन हाथों से मंडप में सर पर आंचल ओढाकर

आशीष दिया उन्ही हाथों ने अवसर पाते ही

मान का प्रतीक  आंचल खींच भी लिया --

धर्म और कर्तव्य की लम्बी चौड़ी कथा

उदहारण दे दे कर सुनाई जिन्होंने

और रात के अंधेरों में वो सारे

आदर्श तार तार हो गये उन्ही के हाथों

वो भाई जैसे थे पिता जैसे थे पर

नहीं वो सिर्फ पुरुष थे ---

शायेद अंधेरो में रिश्ते नहीं दीखते

घिन आती है ऐसे समाज पर ---

अगर कहीं भूल कर भी जिसने

इसका प्रतिकार कर दुत्कार दिया

स्वालम्बी हो अपना निर्णय ले कर

नवजीवन तलाशने का दुस्साहस किया

उफ़ फिर तो रजिस्टर्ड ठप्पा लगा

एक बागी बेलगाम औरत का -----

इतना कुछ उमड़ता घुमड़ता रहा मन में

न जाने क्यों -एक प्रश्न गूंजता रहा बार बार

आज जिसे कहते है हम सब बदल गया

कहाँ बदला है यह समाज ये रिश्ते सब तो वही हैं

पिता सरीखा ससुर बेटी जैसी बहू पर कुदृष्टि डालता है

भाई जैसे देवर परिहास की आड़ में ही सही

भाई की परणीता को निगलने का प्रयास करता है

माँ जैसी सासू माँ सब जानते हुये भी मौन रहने को कहती है

चीत्कार करती है आत्मा --- घुटन होती है मन में

कब तक चलेगा यह आखिर कब तक

माना की सब नहीं पर अधिकतर तो यही है किस्से हैं

जो चारदीवारियों में दम तोड़ देते है ----

फिर वही प्रश्न गूंजता है कब तक चलेगा ?

कहीं रत्ती भर बदलाव से कुछ हुआ है

आज भी नन्ही बच्चियां नरपशुओं के

पैने नुकीले मजबूत जबड़ों तले चबाई जाती है

कभी माएं शर्मसार भी होती हैं बेटों की करतूतों पर

कुछ माएं अपनी ममता के वशीभूत हो उन्हें आंचल तले ढांप लेती है

उनके अक्षम्य अपराधों को भी छुपा लेती है

तो कहीं समाज के समर्थ पुरुष बड़ी बेशर्मी से

चंद  वोटों  के  लिए  इस   निकृष्टतम  कार्य को

बस  लड़कपन की छोटी सी भूल कह जाते हैं

शायेद  वह  भूल  जाते   होंगे  बहु बेटियां  उनके  घर भी  हैं

कैसे आएगा बदलाव --कब आएगा

आखिर आधी आबादी का नन्हा सा टुकड़ा

कब तक चीखता रहेगा न्याय के लिए

उनको धैर्य से सुनते पढते लोग कभी उनका साथ भी देंगे

या बस मुस्करा देंगे एक भाषण एक लेख भर समझ कर

क्या यही आधुनिक समाज है ? --या आदिमयुग में वापसी है ?

----------------- Divya Shukla -----------

13-4-2014

पेंटिग गूगल से साभार

Sunday, 6 April 2014

सुर्ख लाल आंधी !!

लाल सुर्ख आंधी

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एक अरसे बाद आज फिर आई

न जाने क्यूँ सुर्ख लाल आंधी

एकबारगी तो आत्मा काँप उठी

जब जब ये लाल आंधी आती है

कुछ न कुछ छीन ले जाती हैं

पहली बार जब मेरे होशोहवास में आई थी

याद है उस रात को सुर्ख आंधी ने कैसे

इन हाथों को हल्दी से पीला रंग

एक झोंके में ही अपने ही घर में पराया कर दिया था

रोप दिया नन्हे बिरवे को दूसरी माटी में

जब भी जड़े अपनी पकड़ बनाने लगती

हवा का हल्का झोका भी उसे हिला जाता

प्रयत्न किये पर पराई की पराई ही रह गई

कभी जम ही नहीं पाई नई माटी में

आज भी सोचती हूँ अपना घर कौन सा है

बौखल  बदहवास सी  सब को खुश करती फिरती रही

याद ही न रहा मै कौन हूँ मेरी भी कहीं कोई खुशी है

गोल रोटियां गोलमटोल बच्चे और उन्ही के संग

गोल गोल घूमती मेरी पूरी दुनिया यहीं तक सीमाएं खींची रही

कभी कभी मन में रिसाव होता पीडाएं बह उठती सूखी आँखों से

पर सीमाओं को पार करने का साहस कभी न हुआ --न जाने क्यूँ

फिसलन ही फिसलन थी अपनी आत्मा के टपकते रक्त की फिसलन

जब जब बढे पाँव तब तब उसी फिसलन से सरक कर

मेरी जिंदा लाश को पटक आते लक्ष्मणरेखा के भीतर ही --

बड़ी लाचारी से पलट कर देखती तो पाती

दो कुटिल आँखों में कौंधती व्यंग्यात्मक बिजली

चीर देती कलेजा वह तिर्यक विजई मुस्कान -

लाल आंधी की प्रतीक्षा सी तैरने लगी थी अब मन में -

और इस बार सीमाएं तो उसने तहसनहस कर डाली परन्तु

कैद का दायरा बढ़ा  दिया बड़े दायरे में खींची लक्ष्मणरेखा

टुकड़ों में मिली स्वंत्रतता उफ़ साथ में हाडमांस से जुड़े कर्तव्य

अब इस बार क्यूँ आई आज क्या ले जायेगी क्या दे जायेगी

न जाने क्या क्या उमड़ता घुमड़ता रहा रीते मन में -

कोई भय नहीं आज खोने का /ना ही कोई लालसा कुछ पाने की

यही सोचते हुए न जाने कब मै द्वार खोल कर बाहर आ गई

शरीर के इर्दगिर्द ओढ़नी को लपेट कर निर्भीक खड़ी रही

आकाश की ओर शून्य में घूरती हुई -- मुस्कान तैर रही थी मुख पर

और मै धीरे धीरे बढ़ रही थी दूर चमकती हुई एक लौ की ओर

बिना यह सोचे क्या होगा दिए की लौ झुलसा भी सकती है

परंतु बढती जा रही थी बरसों से बंधी वर्जनाओं की डोर झटकती

सारी सीमाओं तोड़ती हुई लक्ष्मणरेखाओं को पैर से मिटाते हुए --

न जाने कितने अरसे बाद पूरी साँस समां रही थी सीने में वरना अब तक

तो बस घुटन ही घुटन थी --और फिर आहिस्ता आहिस्ता मंद स्मित

एक अट्टहास में बदलता गया गूंजने लगी दिशाएँ

बरसों से देह में लिपटी मृत रिश्तों की चिराइंध

बदलने लगी मलय की शीतल सुगंध में -

लक्ष्मणरेखा अब भी है परंतु स्वयं की बनाई हुई

अब इसे मेरी अनुमति के बिना नहीं पार सकता कोई

---------------Divya Shukla ---------------

6-4-2014

पेंटिग गूगल से साभार

Thursday, 27 March 2014

ये भूमिजायें

ये भूमिजायें

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वर्जनाओं की लकीरों को पार कर

एक दूसरे का सहज संबल बन

पाषण के परकोटों से मुक्त हो

सधे क़दमों से सीढी उतरती

अपना अस्तित्व तलाशने

निकल ही पड़ी

ये भूमिजायें
----------
---------दिव्या !!

पेंटिग गूगल से साभार

Friday, 21 March 2014

सहमी हुई सांकलें !!

सहमी हुई सांकलें
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न कितने भारी कदमो की पदचाप

गूंज रही रात्री के नीरव एकांत में !

सहमा सा सन्नाटा फैला चारों ओर

जीरो पावर के बल्ब की पीली रोशनी

भरसक कोशिश कर रही अंधेरो से लड़ने की !

और मै ? पूरी खुली थी मेरी आँखे झपकी तक नहीं

नींद न जाने कहाँ आवारागर्दी कर रही थी !

परंतु मै निद्रावस्था थी या तंद्रा में पता नहीं

सुन पा रही थी आहटें दिख रहे थे काले लबादे !

बूझने की कोशिश करती पर असफल कौन हैं ये --

खिड़की के ठीक नीचे बैठा एक आवारा श्वान

अपने पंजो से खोदा था जिसने एक गड्ढा !

अपनी ही रात्री का ठिकाना --उफ़ कितनी भयानक आवाज़

अचानक जोर से रो उठा वह सिहरन सी दौड गई शरीर में !

क्या उसने भी सुनी वह आवाजे या दिख गए वो स्याह वजूद

अरे ये भागते हुए कदम मेरे घर की तरफ बढ़ने लगे --

उफ़ मै अपने ही शव को अपने ही काँधे पर लाद कर

भाग रही हूँ भागती जा रही हूँ मेरे पैरों का रक्त निचुड़ गया

उनमे मानो पत्थर बंधे हों /मृत्यु से भय नहीं फिर क्यों भाग रही हूँ

अचानक एक चीख से आँख खुल जाती है /किसकी थी वो चीख

/शायेद कोसों दूर मेरी माँ की वो भी जाग गई थी

हां हां यह उसी की पुकार थी मेरा नाम लेकर चीख उठी

और उसकी आवाज़ यहाँ तक गूंज उठी /पीछे हट गए सारे साये

अवचेतन से चेतन में वापस लौट आई मै और फिर --

स्वयम को टटोला जीवन का स्पंदन सीने में बहुत तीव्रगति से हो रहा था

और पूरा शरीर पसीने से भीग उठा था / भारी कदमो से दरवाजे की ओर बढ़ी

दोनों द्वार भयाक्रान्त हो एक दूसरे को जकड़े थे ---

और लटकी थी एक सहमी हुई सांकल ---

--------Divya Shukla -----------

21-3-2014

पेंटिग गूगल से साभार 

Friday, 7 March 2014

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है !

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है 
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अभी से इतना कोलाहल क्यूं मचा है ?
अरे मै औरत हूँ बस यही तो कहा मैने 
अपनी बेड़ियों को अभी तो धीरे धीरे उतारना शुरू किया है 
कुछ कुछ अपने अस्तित्व का भी अहसास किया है

अभी तक तो अनजान थी मै ----या यूँ कहो अनजान बनी रही
मै तो तुम्हारे घर के ड्राइंगरूम का शोपीस ही तो बनी रही
या पलंग की रेशमी चादर ----सहभागिनी थी पर
हर अंतिम निर्णय तो सिर्फ तुम्हारा होता था न क्यूं ? बोलो
स्पष्ट बोलना गुनाह है बेहयाई है सिर्फ मेरे लिये
तुम तो कुछ भी कर सकते हो कह सकते हो ----------
और मै सोच भी नहीं सकती ---------
मैने प्रेम भी किया तुम से ही -----------
तुम्हारे लिये जीती रही तुम में ही जीती रही
संतान को कब जन्म देना है ये निर्णय भी तुम्हारा ही होता
क्यूं की मै तो साधन हूँ न अब तक --बस एक उर्वरा भूमि
पर अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
बस तुम्हें इतना ही तो स्वीकारना है मै वस्तु नहीं भोग्या नहीं
हम दोनों का अस्तित्व बराबर है ----पूरक है हम एक दूसरे के
नहीं बनना मुझे देवी -----मुझे अपना आसमान चाहिये
अपनी उड़ान ---अपनी सोच ----अपना अस्तित्व -------
डरो मत फिर भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
एक नई और आत्मविश्वास से भरी हुई --
अपनी मौलिक सोच के साथ तुम्हें और भी अच्छी लगूंगी
ज़रा सोच कर देखो ---वो समय कितना सुंदर होगा
जब हम दोनों अपने अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ जियेंगे
हम ईमानदार होंगे एक दूसरे से --------------------
तुममे भी धैर्य होगा --मेरी स्वतंत्र सोच को समझने का
मुझमे आत्मविश्वास होगा अपने सारे फैसले लेने का
-----------दिव्या शुक्ला --------------

पेंटिग गूगल से साभार --

8.3.2014