Wednesday, 1 January 2014

ऐ स्त्री तू बस स्त्री ही बनी रह त्रियाचरित्र न दिखा !



स्त्री तू त्रियाचरित्र न दिखा --
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सुनो !कितने मकड़जालों में
उलझा दिया है तुमने हमें
अरे सुनो न -स्त्री चिरैया ही तो है -
पर उसके पंख कुतर दिये
तुम्हारे झूठे अहं ने
पुरुषवादी मानसिकता ने
अवचेतन मन के उस भय ने
जो अनचाहे भी कहीं छुपा है
आज भी तुम्हारे मन में
अनंत आकाश में पंख फैला कर
उड़ान भरने की मधुर चाह में
चहचहाती गुनगुनाती चिरैय्यों
से क्यूँ भयभीत हो रहे हो तुम
उन्ही परों में मुंह छुपा कर
उनसे संबल ले उन्ही की प्रेम उर्जा से
अपना मनोबल बटोरते हो
जब कहीं से ठेस लगती है तुम्हे
और फिर उनके ही पंख काट कर
कहते हो --तुम क्या उड़ोगी -
कमजोर हो तुम उफ़  बहस मत करो
अरे तुम तो कमबख्त स्त्री निकली
पीड़ा को पीती नम आँखों को देख
आखिर बोल ही पड़ते हो तिलमिला कर
अरे सुन तू त्रियाचरित्र न दिखा --
ओह तिरिया कहा तुमने --
कह कर फिर मुस्करा दी व्यंग से
तिलमिला उठी पुरुषवादी मानसिकता
आखिर बोल ही पड़ा तुम्हारे अंदर का अहम
अरे स्त्री तुम्हारा चरित्र तो
देवता भी न समझे सके
तो पुरुष की क्या बिसात --
तभी तो कहा त्रियाचरित्र
हम स्त्रियां जानती है देव हो या मनुज
तुम सब हो तो पुरुष ही बाकी रिश्ते तो बाद में
तुम्हारी समझ में कहाँ आएगी
एक स्त्री मन की पीड़ा उसकी नरम कल्पनाएँ
अनंत आकाश में उड़ने की अदम्य इच्छा
छोटा सा ही सही उसका अपना
आकाश पाने की दबी सी चाह
ओ पुरुष काश तुम समझ पाते
स्त्री के गूढ़ मन का रहस्य
वो ग्रन्थ जिसके पन्ने पन्ने पर
सिर्फ प्रेम लिखा है --
वो ढाई आखर ही बस पढ़ लेते
तब न कहते शायद --समझ पाते
समझ पाते उस स्त्री को जो
घर से बाहर हर उस जगह सफल है जहाँ तुम हो
हर वह कार्य कर सकती है जो तुम सब करते हो
उसकी कलम की धार भी उतनी ही पैनी है जितनी तुम्हारी
पर हाँ तुम्हारी आँखों का दंश वो नहीं झेल पाती
जिनमे तैरते हैं असंख्य जहरीले बिच्छू डंक मारते हुए
वह सड़क पर गिट्टी तोडती स्त्री हो या आफिस में कलम घिसती
अब उनमे से कोई एक अगर तुम्हारी तरफ ऊँगली भी उठा दे
बस यहीं धराशाई हो जाता है -नहीं सहन होती
अपनी तरफ उठी तर्जनी -वह भी किसी स्त्री की
भले ही वह कितना अकाट्य सत्य बोल रही हो
बस -यही से शुरू हुआ -अरे सब त्रियाचरित्र है -
स्त्री तब तक तुम्हारी निगाह में महान है
जब तक वह मौन है भले ही कितना ही दंश झेलना पड़े
तुम नहीं जानते विष अगर कंठ में रोक लेती है नारी
तो जबान से आग उगलती है --परंतु उसको मिले
दंशों का विष अगर शिराओं में बहने लगा
तब जन्म लेती है विषकन्या जो विनाश करती है पाप का
स्त्री धात्री कहलाती है जो मिलता है
उसे ही कई गुना कर के लौटा देती है
जब तुम्हारा दिया तुम्हे लौटा ही देती है
फिर इतनी हाय तौबा क्यूँ ?
एक बात पूछूं बताओगे ?
तुम्हारा भी तो कोई चरित्र होगा
फिर तुम्हारा कोई नाम क्यूँ नहीं
क्या देह की शुचिता सिर्फ स्त्री की ही है
तुम्हारी नहीं ..तुम्हे कुछ भी करने का अधिकार है ?
क्या देह से परे हमारा कोई अस्तित्व नहीं है
-----------Divya Shukla-------------
पेंटिग गूगल से
2-1-2014

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