Friday, 17 January 2014

सुनो ! पथिक -

सुनो !पथिक

-----------------------------

इस अनंत यात्रा में कितना कुछ

कहा अनकहा रह जाता है

प्राणों की तलहटी में हिमनद सा जमा मौन

देह प्रस्तर खंड सी

भटकता मन बावरा सा

कभी निरलस कभी प्राणवान ---

डरती हूँ यदि पिघला एक भी टुकड़ा हिमखंड

तो कितना कुछ बहा ले जायेगा ---

चलो पिघल जाने दें उन सर्द अहसासों को

हिमखंड हो गये हैं

न जाने कितने बरसों से जो

देह की देहरी पर अटकी प्राण वायु

ह्रदय के अतल में

गंगा का गीलापन

सालता रहा मन को

जिसकी टूटी घुन लगी चौखट पर

लगे द्वार पर बरसों से जड़े थे

जंग लगे ताले --जो बहरे थे

नहीं जाती थी कोई भी ध्वनि

ना ही कोई प्रकाश जहाँ

सुनो पथिक क्या तुम पथ भूल गए हो

बोलो न कहाँ से आये क्यूँ आये

क्या तुम कुछ लगते हो मेरे

पता नहीं चला कब तुमने

लपेट लिया इस सूखती लता को

स्वयं अपने वटवृक्ष से व्यक्तित्व से

पुनर्नवा करने का प्रण कर

अब पता नहीं वह सूख कर मृत होगी

या तुम्हारी सांसो की ऊष्मा उसमे

नवजीवन का संचार करेंगी

परंतु जीवन के इस पहर में

न कब से प्रतीक्षारत मै

तुम से ही प्रश्न करती हूँ

क्या यही प्रेम है क्या तुम ही हो

मेरे अनंत जीवन के सखा सहचर

जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी --

क्या तुम्हे भी मेरी खोज थी

उत्तर दो यायावर

तुम तो जानते हो

मेरे पास सहज मौन के सिवा

कुछ भी नहीं -- अपने प्रश्नों के उत्तर

तो तुम मेरी आँखों में एवं

मेरे मौन के कंपन में भी

 पढ़ लेते हो -- सत्य कहा न

पर तुम तो उत्तर दो -दोगे न ?

प्रतीक्षारत हूँ -

मेरे अनंत जन्मो के सहचर

--------Divya Shukla ------

17-1-2014

पेंटिग गूगल से