Friday, 24 January 2014

धुल गये सब सुख भी सिंदूर के साथ ही !





धुल गए सब  सुख भी  सिंदूर के साथ ही
 

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ये किसने सांकल खटखटाई

शायेद कोई अपना हो

दौड कर खोला द्वार परंतु

मतिभ्रम -है सब अपने तो

तभी हुए थे पराये जिस पल

सिंदूर के साथ धो दिए गए सुख

तन को जीते जी दिया गया कफन

घर में एक कोना भी नहीं बचा

सुदूर भेज दिया बोझ जो थी

उन्ही अपनों पर जो लाये थे

बड़े चाव से घर की लक्ष्मी

और उनके लिए भी जिनकी बेटी थी

जो अब अपने थे पुत्र था पुत्रबधू भी

बस सात फेरों का नाता जिससे था

उसकी साँस टूटते ही हर डोर टूट गई

बदल गया रावरंग बदल गए नाते

सोच रही हूँ हम ही क्यों ?

हम पर ही यह सब क्यों

चूड़ियों के साथ क्यों टूटते है

आज भी सुखों से नाते

सिंदूर धुलते ही सब रंग धुल जाते हैं

भूख भी मार दी जाती है

मृत्यु की प्रतीक्षा करने को

छोड़ दिया जाता है हमें अछूत बना कर

उसके धाम में जो जग को जीवन देता है

भजन गा गा कर प्रतीक्षा किया करते हैं

मृत्यु की कभी हथेली भी फैलती है दो रोटियों के लिए

और घिसटती रहती है जिंदगी दूसरों की दया पर

कातर आँखे देखती है रास्ता फिर भी

उन्ही अपनों का जो अपने थे ही नहीं

एक जैसी औरतें एक सी परिस्तिथियाँ

एक सी शक्लें भी हो जाती है जिनकी

सब की सब विधवाएं कहलाती हैं वह

सूनी आँखे चमक उठती है कुछ याद करके

एक दूसरे से बांटती है सब सुख दुःख

झगड़ती है खीजती है और रोती है

एक दूसरे से लिपट कर भीगता है

उनका आंचल दूसरे की आँखों के जल से

शायेद एक ही प्रश्न कौंधता है सबके मन में

अगर हम मर गई होती तो क्या होता

कोई बोल भी पड़ती कभी -तो दूसरी उत्तर देती

कुछ नहीं होता पगली फिर एक नया उत्सव होता

और सिंदूर नई कोरी मांग में सजा दिया जाता

उफ़ --फिर खटकी कुण्डी फिर बजी सांकल

टूट गई सोच की पीड़ादायक श्रृंखला जानती हूँ

पता था कोई अपना न होगा फिर भी आतुर मन का क्या

देखा कोई न था हवा थी जो तेज झोंके से

टूटे किवाड़ों की सांकले बजा गई -

परंतु अब तो प्रतीक्षा है जिसकी

वह क्यूँ नहीं आती --झुकी कमर

धुधली दृष्टि से ढूंढती फिरती हूँ अब

तंग गलियों में --साक्षी हैं अब तो

हर मंदिर की मूर्तियां भी -जो सुनती है

भजनों में गूंजता जीवन का विलाप

यही नियति है हमारी आज भी

ना जाने कितने स्त्री विमर्श होते हैं कानून बनते हैं

परंतु हमारे शव आज भी संस्कार नहीं पाते

उन्हें अग्नि नहीं मिलती --- कभी सोच कर देखो

भजन करते मंजीरो और मंदिरों की घंटियों के साथ

सिसकते हुए नन्हा बचपन कब झुर्रियों में बदल जाता है

इन सैकड़ों जोड़ी आँखों में नमी तो मिलेगी

परंतु सूखी हुई जिनमे अब कोई सपना नहीं पनपता

हम धाम की जीती जागती प्रेतात्माओं को भला

कहाँ अधिकार है अब सुर सजाने का

हम तो बस भजनों में अपना विलाप और

 धूप बत्तियों में अपना दुःख सुलगा कर

उस परमात्मा को समर्पित करते हैं -

जो हमे नित्य देखते हैं मूर्ति स्वरूप में

हम है वृन्दावन की अभिशप्त विधवाएं

---------Divya Shukla --------


25-1-2014

चित्र गूगल से साभार