Tuesday, 28 January 2014

कुछ और ही मुकाम था मेरी जिन्दगी का !!

कुछ और ही मुकाम था मेरी जिन्दगी का !
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कुछ और ही मुकाम था मेरी जिन्दगी का

प्रारब्ध ने मुझे कहीं और अटका दिया

बस उसी मुकाम की तलाश में

भटकता ये मन कभी तो लगता है

अपने ही भीतर श्रेष्ठ भग्न मूर्तियों का

मानो बियाबान में कोई उजाड़ सा मंदिर

रिश्तों के मुखौटे मुहँ चिढाते हुए दीखते

और लग्न मुहूर्त से बंधे बंधन सब झूठे

सब व्यर्थ --आसक्ति और अनासक्ति

में झूलता कभी निकल भागने की चेष्टा तो

कभी एक खोज फिर उसी सूत्र की जिसका सिरा

कहाँ है किसके हाथ में है एक अजीब सी उत्कंठा

अनंत जन्मो से उसी सूत्र का एक सिरा थामे

उसका अगला सिरा किसके हाथ में है --

बस उसी की तलाश में आज तक भटकता ये मन

अपने उसी जन्मजन्मान्तर के सहचर को खोजता है

कभी लगा भी बस यही पर समाप्त हुई बरसों की खोज

कोई हाथ सूत्र का अगला सिरा थामे है आभास भी हुआ

और घुल गया सम्पूर्ण अस्तित्व ही हवा में

और फिर अचानक उफ़ यह क्या हुआ ?

न जाने कैसे फिसल गया वो सूत्र हाथों से -------

और उसको थामे हुये वो हाथ गुम हो गया ------

गहन अंधकार में ---न जाने कहाँ --

जहाँ से बस प्रतिध्वनित होती है बस अपनी ही आवाज़

और फिर वही जन्म जन्मान्तर के सहचर की खोज में

भटकती हुई ये एकाकी देह ये बावरा सा मन

कब तक चलेगी ये यात्रा कहाँ छुप गया है वह ??

एक फूल की चाह में कंटीली झाडियों में उलझ कर

अटक कर आत्मा तक घायल हो जाती

फिर धीमे धीमे अपनी ही पीर को पीता रहता मन

------------Divya Shukla--------------

March-2013

पेंटिंग गूगल से साभार