Sunday, 5 January 2014

चुकता ही नहीं टूटे चाँद का दर्द भरा प्याला !!




चुकता ही नहीं टूटे चाँद का दर्द भरा प्याला !!

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उफ़ ये क्या कर दिया तुमने ?

धूप को जुल्फों में भटकने दो

उम्र के पौधे तो परवान चढ़ते ही है

कोई सीमा रेखा नहीं --कुछ मत सोचो

इच्छाएं अपना रास्ता जानती है

उन्हें क्यूँ रोकना -किसलिए रोकना

इसका कोई औचित्य ही नहीं

वक्त पर छोड़ दो वो संभालेगा

जिंदगी बहती हुई खारी नदी है --

कभी शांत तो कभी मचलती हुई

कभी दर्द बहा ले जाती है

तो कभी सूखे जख्मो की

उधड़ी पपड़ियों को धो देती है

खारे पानी से -छोड़ जाती है

एक चिलकन /टीस दर्द की

जिसे घूंट घूंट कर पीते रहते है

चुकता ही नहीं टूटे चाँद का दर्द भरा प्याला

कैसे समझाऊं तुम्हे अब इनकी आदत सी हो गई

यह दर्द नितांत अपने हैं पास रहते है

हर जगह जड़ें जमा ली इन्होने

कमबख्त आँखों का तो पट्टा ही करवा लिया है

अब मुस्कान में भी झलकने लगे -

लाख रोका मानते ही नहीं

अब तुम्हे क्या हुआ उफ़ सुनो तो -

मेरी बचीखुची मुस्कान तुम से ही तो है पर -

देखो बुरा न मानना न मै तुम्हे बाँट सकती हूँ

न ही तुमसे अपना दर्द बाँट सकती हूँ -

बस यही एक मुश्किल है जरा सी तंगदिल जो हूँ

अब जो चाहे सोचो तुम -----

जानते तो हो जिद्दी हूँ थोड़ी थोड़ी

ऐसा करो सब बह जाने दो इसी खारी नदी में

तुम इन सब को आज़ाद छोड़ दो बस ---

फिर कोई घुटन नहीं अब ---कोई उलझन नहीं

उफ़ कब रात गुजर गई पता ही न चला

एक बात बताऊँ कभी कभी मुझे लगता

मेरे अंदर कोई आसेब सा बस गया है

सारे दर्द को टूटे चाँद वाले प्याले वही तो पीता है

अरे हाँ कहा न तुम हो न मेरे पास --

हर वक्त --पर ---अच्छा छोडो फिर बताउंगी

जानते तो हो मुझे आधी बात कहने की आदत है

इस बात पर तुम्हे बहुत चिड़चिड़ाहट होती है न 


पर न जाने क्यूँ मुझे लगता है आधी तुम

खुद समझ जाओगे जैसे मुझे समझते हो

मुझसे भी ज्यादा  :)

---------Divya Shukla--------

पेंटिग  गूगल से साभार
६ -१-२०१३