Tuesday, 7 January 2014

डूबता सूरज और -टुकड़ों में बिखरी मै

डूबता सूरज और -टुकड़ों में बिखरी मै

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अक्सर ही मै शाम को

डूबते सूरज को घर की --

सबसे ऊँची छत से निहारती फिर

देर तक रोई अपनी आँखों की लाली

मै सूरज को सौंप के नीचे आ जाती

पता है क्यूँ --उन लाल आँखों में

क्रोध और आसूँ दोनों ही होते

जिसे सूरज मुझे बिन बताये

दिन में धूप बना कर खर्च कर देता

दिल तो करता खुद को समेट लूँ पर

छिटक के बिखर के इतने हिस्सों में

बंट चुकी हूँ अब जब खुद को ढूंढती हूँ तो

मेरे अंदर की बेचैन स्त्री मुझसे ही

झगडती कौन हो तुम कहाँ हो तुम

अस्तित्व कहाँ है तुम्हारा ? और जब

स्वयं को तलाशने निकली तो महसूस किया

एक बड़ा हिस्सा माँ के घर भी था जहाँ

बाबा के पश्मीने के शाल पर हाथ फिरा

और ओढ़ कर पिता की ऊष्मा पाती

तो बीमार माँ की सूनी आँखे में उभर आते

वो अनकहे प्रश्न --- तू खुश तो है न

--नम आँखों का वो दर्द मुझे सालता रहता

मैने उस पीड़ा को लपेट लिया अपने शाल में

और आसमान से झांकते अपने बाबा की

प्यार भरी आँखों की छबी बाँध लाई

आंचल के छोर में --मोह दर्द चिंता

और स्नेंह की वो पोटली रख दी सबसे छुपा के

मायके उस वाले संदूख में जो विदा पे मिला था

फिर तलाशने लगी खुद को उस संसार में

जो सात फेरों में मुझे मिला जहाँ सिर्फ अपेक्षायें थी

कर्तव्य थे कुछ ममत्व के कुछ रिश्तों के भी

बड़े प्रेम से जिन्हें पूरा करते करते खुद को भूल गई थी

धीरे धीरे वक्त बीतता गया बच्चे बड़े होते गए

और खुदबखुद आउट डेट होती गई मेरी जिंदगी

यूँ लगा मेरी जरूरत ही अब ख़तम हो गई

सब का ध्यान रखते रखते खुद को बिसर गई थी

आँखे मूंद कर सोचने लगी और खुद को पाया

वहां जहाँ सबसे सुंदर हिस्सा था जीवन का

अपनी हेप शेप फ्रेंड्स के बीच में--कानो में गूंज उठी

उन चार टीनएज गर्ल्स की शोख बातें जिनमे एक मै भी थी

उन दिनों बाबा मेरी शादी तय कर चुके थे

वो तीनो मुझे चिढ़ा रही थी रुठनी तुझे तो बेचारा

मना मना के ही थक जाएगा जो तेरे पल्ले बंधेगा

गुस्सा मेरी नाक पे रहता था उन दिनों

एक पूछ बैठी अच्छा ये बता तुझे कैसा लड़का चाहिए

अचानक मै बोल पड़ी जो मेरे साथ हो तो तुम सब को जलन हो

मुझे इतना प्यार करे की काँटा मुझे चुभे दर्द उसे हो

वो मुझे झोपडी में भी रखे तो चलेगा बस मेरा दिल न दुखाये

आज अपने बिखरे अस्तित्व को समेटते सोच रही हूँ

कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता

कभी ज़मी तो कभी आसमा नहीं मिलता

दो आंसू दो तरफ ढलक गए बस वो न ही मिला जो चाहा

बाकी सारी दुनिया की नेमत थी ----आँख लग गई थी

अचानक बेटी की आवाज़ सुन कर चौंक गई कब आई ये ?

मुझसे लिपट गई आंसू तो थे वो मेरे प्यार में निकल आये

मैने पूछा खुश है न तू शर्मा के मुस्करा दी ----

आँखों की चमक पढ़ ली थी मैने और निश्चिन्त हो गई

उस दिन मै टुकड़ों में बिखरी जरुर थी लेकिन

अब मेरे सारे टुकड़े जुड़ के मेरी बेटी का रूप धर लिए है

और मेरा यह नया रूप अपनी जमीन अपना अस्तित्व

बखूबी संभाल कर रखेगा बेटी का आदर्श बन सम्पूर्ण हो गई मै

-------------------Divya Shukla--------------------

पेंटिग गूगल से साभार