Saturday, 15 February 2014

चूल्हे की आग और मिर्चो की जलन !

चूल्हे की आग और मिर्चो की जलन

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जठराग्नि अधिक जलाती है

मिर्चो की जलन तो कुछ भी नहीं

लाल मिर्च की जलन पता ही नहीं चलती

दिन ढले जब चूल्हे में आग जलती है

उसकी आंच में चमकते है नन्हे चेहरे

तवे की रोटी पर टकटकी लगाये ताकते हुए

दिन भर की भूख से सूखे पपडाए ओठ

रोटी ठंडी होने का भी धैर्य नहीं रख पाते

निगलते हैं जल्दी से माँ कहती है धीरज रख

रुक जा अटक जाएगा गले में तनिक धीरे खा न

ठंडा होने दे न कहीं भाग नहीं जाएगा

सहला देती है प्रेम से उनके तृप्त  मुख को

दिन भर की थकन गायेब हो जाती है न जाने कहाँ

फिर तैयार हो जाती है नये दिन के लिए

सुलाते हुए अपने करेज़े के टुकड़ों को

निहारती है सारी सृष्टि की कोमलता समा जाती है

दो  ममतामयी आँखों में ---

अचानक नरम गालों को सहलाते थपकते हाथ

कोई पकड़ लेता है खुरदरे हाथ चुभ गए थे

अरे अम्मा तुम्हारे हाथ कितने सूज गए है

जलन हो रही है ना अम्मा बोलो न --

लाओ हम ठीक कर दें और चूम लिया

नन्हे नरम ओठों से --न जाने क्या जादू किया

उड़ गई जलन मिर्चों की -पर सच तो यही है न

अपनों के पेट की अग्नि अधिक जलाती है -

-इन मिर्चो की जलन तो कुछ भी नहीं

------------Divya Shukla ---------------

15-2-2014

चित्र गूगल  से  साभार