Sunday, 9 February 2014

पिघलती परछाइयां !!




पिघलती परछाईयां !

------------------------

सूरज तनिक तिरछा हो कर

लटक गया नीम की सबसे

ऊँची फुनगी पर --

जरा सी देर और फिर

सरक जाएगा सूरज

और फिर अँधेरा --तभी

साँझ चुपके से एक दिया

थमा गई रात के हाथों में

दिये की मद्धम रोशनी में

सहमा सा सन्नाटा --

अधबूढी नीम तले बैठी

मूर्तियों सी दो परछाइयां

बीच में पसरा मौन

कुछ ऐसा लगता है

चकवा चकवी के बीच

चंदन का गाछ तना खड़ा हो

कोहबर में उकेरी आकृतियों सा

हवेली के सबसे ऊँचे परकोटे पर

टिके चन्द्रमा की तिरछी दृष्टि से

तलइया के गंदला पानी में भी

चांदनी का उजास झिलमिला उठा

पीपल बरगद के बीच बने शिवाले में

औढरदानी समाधिस्थ बैठे --

वहीँ उसी द्वार पर --

रुद्राक्ष के मनके गिन कर सहेज के

सिरहाने रख सोई बूढी काया

पत्तों की सरसराहट से उचटती है

कच्ची नींद - अंधेरों को बूझने का

असफल प्रयास करती ---

सहम के काँप उठी परछाईयां

एक आवाज़ गूंजी ---

सुनो भय क्यूँ - हमारे बीच

चंदन का गाछ है न --

चलो जी लें जीवन के पवित्रतम पल

कल की भोर मिले न मिले --

परंतु चेहरे पर उतर आया

नीम की पत्तियों का पीलापन

पुतलियों से रिसते गीलेपन से

लीप उठा माटी का चबूतरा

पसर गई पीड़ा -रक्तिम हुए नेत्र

ओढ़हुल के पुष्पों से

मन के कोटर में पल रहा

आशंकाओं का अजदहा

पल पल लीलता जा रहा था

अधूरे स्वप्नों को - तभी

बिन काजल की आँखे दिपदिपा उठी

तुलसी के चौरे पर जलते दिये सी

उसकी आंच में पिघल गईं परछाईयां

लिपे हुए चबूतरे पर फिर कभी

चंदन का गाछ नहीं दिखा

कच्ची  माटी के उसी चबूतरे पर

न जाने कहाँ से उग आये

दो फूल ---जो कभी नहीं मुरझाते

--------Divya Shukla --------

9-2-2014

पेंटिग गूगल से