Friday, 21 March 2014

सहमी हुई सांकलें !!

सहमी हुई सांकलें
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न कितने भारी कदमो की पदचाप

गूंज रही रात्री के नीरव एकांत में !

सहमा सा सन्नाटा फैला चारों ओर

जीरो पावर के बल्ब की पीली रोशनी

भरसक कोशिश कर रही अंधेरो से लड़ने की !

और मै ? पूरी खुली थी मेरी आँखे झपकी तक नहीं

नींद न जाने कहाँ आवारागर्दी कर रही थी !

परंतु मै निद्रावस्था थी या तंद्रा में पता नहीं

सुन पा रही थी आहटें दिख रहे थे काले लबादे !

बूझने की कोशिश करती पर असफल कौन हैं ये --

खिड़की के ठीक नीचे बैठा एक आवारा श्वान

अपने पंजो से खोदा था जिसने एक गड्ढा !

अपनी ही रात्री का ठिकाना --उफ़ कितनी भयानक आवाज़

अचानक जोर से रो उठा वह सिहरन सी दौड गई शरीर में !

क्या उसने भी सुनी वह आवाजे या दिख गए वो स्याह वजूद

अरे ये भागते हुए कदम मेरे घर की तरफ बढ़ने लगे --

उफ़ मै अपने ही शव को अपने ही काँधे पर लाद कर

भाग रही हूँ भागती जा रही हूँ मेरे पैरों का रक्त निचुड़ गया

उनमे मानो पत्थर बंधे हों /मृत्यु से भय नहीं फिर क्यों भाग रही हूँ

अचानक एक चीख से आँख खुल जाती है /किसकी थी वो चीख

/शायेद कोसों दूर मेरी माँ की वो भी जाग गई थी

हां हां यह उसी की पुकार थी मेरा नाम लेकर चीख उठी

और उसकी आवाज़ यहाँ तक गूंज उठी /पीछे हट गए सारे साये

अवचेतन से चेतन में वापस लौट आई मै और फिर --

स्वयम को टटोला जीवन का स्पंदन सीने में बहुत तीव्रगति से हो रहा था

और पूरा शरीर पसीने से भीग उठा था / भारी कदमो से दरवाजे की ओर बढ़ी

दोनों द्वार भयाक्रान्त हो एक दूसरे को जकड़े थे ---

और लटकी थी एक सहमी हुई सांकल ---

--------Divya Shukla -----------

21-3-2014

पेंटिग गूगल से साभार