Friday, 7 March 2014

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है !

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है 
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अभी से इतना कोलाहल क्यूं मचा है ?
अरे मै औरत हूँ बस यही तो कहा मैने 
अपनी बेड़ियों को अभी तो धीरे धीरे उतारना शुरू किया है 
कुछ कुछ अपने अस्तित्व का भी अहसास किया है

अभी तक तो अनजान थी मै ----या यूँ कहो अनजान बनी रही
मै तो तुम्हारे घर के ड्राइंगरूम का शोपीस ही तो बनी रही
या पलंग की रेशमी चादर ----सहभागिनी थी पर
हर अंतिम निर्णय तो सिर्फ तुम्हारा होता था न क्यूं ? बोलो
स्पष्ट बोलना गुनाह है बेहयाई है सिर्फ मेरे लिये
तुम तो कुछ भी कर सकते हो कह सकते हो ----------
और मै सोच भी नहीं सकती ---------
मैने प्रेम भी किया तुम से ही -----------
तुम्हारे लिये जीती रही तुम में ही जीती रही
संतान को कब जन्म देना है ये निर्णय भी तुम्हारा ही होता
क्यूं की मै तो साधन हूँ न अब तक --बस एक उर्वरा भूमि
पर अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
बस तुम्हें इतना ही तो स्वीकारना है मै वस्तु नहीं भोग्या नहीं
हम दोनों का अस्तित्व बराबर है ----पूरक है हम एक दूसरे के
नहीं बनना मुझे देवी -----मुझे अपना आसमान चाहिये
अपनी उड़ान ---अपनी सोच ----अपना अस्तित्व -------
डरो मत फिर भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
एक नई और आत्मविश्वास से भरी हुई --
अपनी मौलिक सोच के साथ तुम्हें और भी अच्छी लगूंगी
ज़रा सोच कर देखो ---वो समय कितना सुंदर होगा
जब हम दोनों अपने अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ जियेंगे
हम ईमानदार होंगे एक दूसरे से --------------------
तुममे भी धैर्य होगा --मेरी स्वतंत्र सोच को समझने का
मुझमे आत्मविश्वास होगा अपने सारे फैसले लेने का
-----------दिव्या शुक्ला --------------

पेंटिग गूगल से साभार --

8.3.2014