Saturday, 12 April 2014

कब तक चीखता रहेगा आधी आबादी का एक टुकड़ा

कब तक चीखता रहेगा आधी आबादी  का एक टुकड़ा

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ये नारी मन भी कितना विचित्र है

दुःख में सुख ढूंडता है -----

पीड़ा में प्रसन्नता खोजता है ---

अधिकतर दुःख वह खुद के लिए रख लेती है

और सुख बाँट देती है कभी

अपनों को कभी औरों को

पीहर में बेटी ससुराल में कुलबधू

जैसे भारीभरकम शब्द से सुशोभित

पिता की पगड़ी ससुर की सामाजिक प्रतिष्ठा

का टनों बोझ संभाले दबी जाती है वो बेचारी

उस पर भी अगर अकेली है

तो फिर तो कल्याण ही है

वो पढ़ा लिखा तबका हो या गाँव

हर जगह पति नाम का तमगा जरुरी है

वो चाहे नाम का ही हो --- बस है काफी है

और अगर नहीं है ये तो फिर

माँ से लेकर महरी तक उपदेश देंगी

वो पति परमेश्वर की माँ हो या खुद की

कहीं कभी यह भी हुआ और होता भी आ रहा है

जिन हाथों से मंडप में सर पर आंचल ओढाकर

आशीष दिया उन्ही हाथों ने अवसर पाते ही

मान का प्रतीक  आंचल खींच भी लिया --

धर्म और कर्तव्य की लम्बी चौड़ी कथा

उदहारण दे दे कर सुनाई जिन्होंने

और रात के अंधेरों में वो सारे

आदर्श तार तार हो गये उन्ही के हाथों

वो भाई जैसे थे पिता जैसे थे पर

नहीं वो सिर्फ पुरुष थे ---

शायेद अंधेरो में रिश्ते नहीं दीखते

घिन आती है ऐसे समाज पर ---

अगर कहीं भूल कर भी जिसने

इसका प्रतिकार कर दुत्कार दिया

स्वालम्बी हो अपना निर्णय ले कर

नवजीवन तलाशने का दुस्साहस किया

उफ़ फिर तो रजिस्टर्ड ठप्पा लगा

एक बागी बेलगाम औरत का -----

इतना कुछ उमड़ता घुमड़ता रहा मन में

न जाने क्यों -एक प्रश्न गूंजता रहा बार बार

आज जिसे कहते है हम सब बदल गया

कहाँ बदला है यह समाज ये रिश्ते सब तो वही हैं

पिता सरीखा ससुर बेटी जैसी बहू पर कुदृष्टि डालता है

भाई जैसे देवर परिहास की आड़ में ही सही

भाई की परणीता को निगलने का प्रयास करता है

माँ जैसी सासू माँ सब जानते हुये भी मौन रहने को कहती है

चीत्कार करती है आत्मा --- घुटन होती है मन में

कब तक चलेगा यह आखिर कब तक

माना की सब नहीं पर अधिकतर तो यही है किस्से हैं

जो चारदीवारियों में दम तोड़ देते है ----

फिर वही प्रश्न गूंजता है कब तक चलेगा ?

कहीं रत्ती भर बदलाव से कुछ हुआ है

आज भी नन्ही बच्चियां नरपशुओं के

पैने नुकीले मजबूत जबड़ों तले चबाई जाती है

कभी माएं शर्मसार भी होती हैं बेटों की करतूतों पर

कुछ माएं अपनी ममता के वशीभूत हो उन्हें आंचल तले ढांप लेती है

उनके अक्षम्य अपराधों को भी छुपा लेती है

तो कहीं समाज के समर्थ पुरुष बड़ी बेशर्मी से

चंद  वोटों  के  लिए  इस   निकृष्टतम  कार्य को

बस  लड़कपन की छोटी सी भूल कह जाते हैं

शायेद  वह  भूल  जाते   होंगे  बहु बेटियां  उनके  घर भी  हैं

कैसे आएगा बदलाव --कब आएगा

आखिर आधी आबादी का नन्हा सा टुकड़ा

कब तक चीखता रहेगा न्याय के लिए

उनको धैर्य से सुनते पढते लोग कभी उनका साथ भी देंगे

या बस मुस्करा देंगे एक भाषण एक लेख भर समझ कर

क्या यही आधुनिक समाज है ? --या आदिमयुग में वापसी है ?

----------------- Divya Shukla -----------

13-4-2014

पेंटिग गूगल से साभार