Monday, 14 April 2014

अनवरत सिलसिला --कशमकश का

अनवरत सिलसिला --कशमकश का 

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अतीत को कितनी ही गहरी कब्र में दफना दें 

मन पर वर्तमान की लगी हल्की सी भी ठेस से 

अतीत भयानक प्रेत की भांति सामने आ खड़ा होता

प्रतिशोध और घृणा और भी प्रबल हो उठती है प्रेत से 

आखिर वर्तमान से मिला दुःख का जिम्मेदार भी अतीत ही है न 

अब किसने गुनाह किये सज़ा किसने पाई 

यह कौन देखता है --पर प्रेत कैसे मरता है 

शायेद कभी नहीं --अंतरात्मा की गहरी अँधेरी खोह में 

दबा छुपा बैठा रहता है -- --अपनी हार का मातम मनाता 

वर्तमान की हल्की सी खरोंच से निकली 

एक दर्द भरी सिसकी से चौंक उठ जाता है 

और बलबला कर सामने आ खड़ा होता है देखते ही 

एक घृणा का सैलाब उमड़ता है नम आखों में 

और बरसते हैं तेजाबी आंसू जिसमे 

जला देने की तीव्र आकांशा --प्रतिशोध की वह भावना 

जो वर्तमान की चंद ठंडी फुहारों से बुझ सी रही थी 

लेकिन राख में भी चिनगारिया दबी रहती है 

उफ़ -----एक गहरी सांस ले वो बोलती रही 

और मौन हो मै सुनती रही महसूस करती रही 

उसकी अनकही पीड़ा -- जानती हूँ -उसका कोमल मन जो 

टुकड़ों में टूटता ही जाता बार बार --फिर जुड़ता है फिर टूटता है 

एक अनवरत चलने वाला सिलसिला -

कब तक आखिर कब तक ?

-------------Divya Shukla -------

15-4-2014

पेंटिग गूगल  से  साभार