Wednesday, 16 April 2014

एक टुकड़ा धूप का !!

एक टुकड़ा धूप का

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यादों की मुंडेर से

तांक झांक करती धूप

एक टुकड़ा धूप

खोजती फिरती

कोई सुगबुगाहट

अहसानमंद रहेंगे

अंधेरों के जिसने

छुपा लिये ज़ज़्बात

स्याह रात की आड़ मे

बालों को चेहरे पर

बिखेर कर ढंक दिया

भीगी पलकों को --

खुली खिड़की से आती

तेज हवा ने -----

मांगने लगी वो भी

इन आँखों की नमी --

कैसे दे दूँ इसे

सारे गिले शिकवे

इसमें ही बह जाते हैं

रोज़ सोने से पहले

जो तुम से करती हूँ मै

रह जाती है बस धूप

एक टुकड़ा धूप

सुनहरी यादों भरी

रोज़ हमें फिर से

मिलाने कोशिश करती

यादों की मुंडेरों से

रोज़ ही झांकती है

मेरे पास तो

जाती तो होगी

तुम तक भी

नहीं पहुँच पाई क्या ?

बंद खिड़की की झिरी से

एक किरन तो गई ही होगी

तुम्हारे पास -------

--और याद तो

तुम्हें भी होगी ही न

---- Divya Shukla -------

17-4-2014

चित्र गूगल से साभार