Friday, 18 April 2014

तुम इतना भी नहीं समझते ?

तुम इतना भी नहीं समझते ?

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सुनो !आज न जाने क्यूँ

तुम बहुत याद आ रहे हो

तुम्हारे पास बैठ बस

तुम्हे निहारते रहने को

दिल कर रहा है

बिना बोले न जाने

कितनी बातें करनी हैं

तुम्हारी प्रतीक्षा में -

मेरी निगाहें रह रह के

दरवाज़े पे टहल आती हैं

हवा से भी जब सांकल बज उठती

तो बार बार तुम्हारे ही आने का

भरम न जाने क्यूँ होता है --

सोचती हूँ पता नहीं तुम्हे 

मेरी याद भी आती है या नहीं ?

पता है मुझे तुम यहाँ कहीं नहीं हो 

सुनो एक बात कहूँ शायेद 

तुम नहीं जानते तुमसे ज्यादा

तुम्हारे होने का अहसास प्रिय है 

मुझे --हैं न अजीब सी बात

देखो अब फिर कभी न कहना 

कि कहा नहीं मैने -तुम्हे तो पता है 

मै कह नहीं पाती हूँ कुछ --

अब कल की ही तो बात है

जब तुम ने कहा था ---

तुम्हे इश्क है मुझसे -

उफ़ पता भी है तुम्हे -----

इक जलतरंग सी बज उठी थी

बस ये सुन कर मन में ---

कान की लवें गर्म हो गई

पलकें अकेले में भी

लाज से झुक गई थी

फिर यही सवाल तुमने मुझसे भी पुछा 

नहीं बोल पाई मै कुछ भी ---

शब्द गले में अटक से गये 

जब की फोन पर थी --

तुम सामने भी तो नहीं थे --

अगर झूठ कहना होता तो

तो कह ही देती -नहीं है 

पर सच कैसे कह देती कि 

हाँ मुझे भी इश्क है तुम से

कितना मुश्किल है ये कहना उफ़

और तुम ना कितना हसें थे मुझ पर 

बिना कहे क्या नहीं समझ सके तुम

कितने खराब हो तुम -----

-------चलो हटो जाओ भी -- :) :)

---------Divya Shukla ------

चित्र  गूगल से साभार