Sunday, 20 April 2014

हम और तुम -ज्यूँ --नदी के ये तट

हम और तुम -ज्यूँ --नदी के ये तट

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अपार जलराशि को समेटे हुये

-------तीव्र गति से बहती हुई

नदी को गवाक्ष से --------

----निहार रही थी मै -उस पार

चौड़े पाट को नदी के अपार विस्तार को ----

दुसरे तट को ---सोचती रही मै

------ये दोनों तट कभी नहीं मिलते

फिर भी कभी विलग भी तो नहीं -----

-----अंतिम छोर तक साथ रहते हैं

पर कभी स्पर्श भी न कर पाते -------

----एक दुसरे का -- बहुत निकट होते हुये भी

जब ग्रीष्म की ऊष्मा सोख लेती जल को----

-----कुछ पास से निहार लेते वो

मौन के सुखद संवाद हैं उनके पास----

---शब्दों के सेतु की क्या आवश्यकता

कुछ उसी तरह जैसे ----हम और तुम

----------न जाने कितनी बातें

तुमसे ---सिर्फ तुम्ही से --------

-----------मौन के माध्यम से

हमारे बीच शब्दों की ---------

---------आवश्यकता ही कहाँ

बिन कुछ बोले ही तुम -------

-------पढ़ लेते हो मन को मेरे

और मै तुम्हारे मौन को --------

-----------नदी के दो तट ही तो है

पर दूर कहाँ -----------

---------Divya Shukla ----

जनसत्ता 2013 दीपावली वार्षिकांक में छपी यह रचना

पेंटिग गूगल से साभार