Tuesday, 22 April 2014

सुनो ! वैदेही कुछ तो बोलो -

सुनो ! वैदेही कुछ तो बोलो

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न जाने कितनी मनौतियों मांगी देवी मईया से

बहुत अनुनय विनय की थी बाबा नें

तब कहीं जन्मी थी वैदेही ---दुनिया में आते ही -

बंदूकें दाग कर स्वागत हुआ था उसका

लोग जलभुन कर बोले भी --छठी मनाये हैं

मानो कुलदीपक जन्मा हो ---पराई अमानत है

इतना दुलार ---कभी कभी माँ झुझला भी जाती --

बोलती सुनो ! कहाँ ब्याहोगे इतना न बिगाड़ो दुलार से

बाबा ठठा कर हँसतें राजकुमारी है मेरी

उसे क्या जरूरत कुछ सीखने की ----

राजकुमार खुद से मांग कर ले जायेगा ---

---और हुआ भी यही ---एक दिन आया

बाबा बीमार हुये सबसे ज्यादा फिकर हुई

अपनी लाड़ली की तेरह चौदह साल की ही हुई थी

रिश्ता भी आ गया खुद चल कर ------

---घर वर दोनों ही मन मुताबिक ------

वैदेही का रघुवीर से नाता जुड ही गया

गुड़िया और सखियों के साथ गुट्टे खेलने की उम्र में

सात फेरे हुये ---वो बस यही सोच कर खुश थी

अब पता चलेगा माँ को ---बहुत डांटती थी न --

अब जाओ याद करो मुझे ---न गहने का मोह न कपड़ों का

ससुराल में माँ से भी प्यारी सासू माँ ---हर भूल छुपा लेती वो

पर जिसे समझना था वो तो समझ ही नहीं पाया ----

उसके लिये तो घर की तमाम कीमती चीजों की

तरह ही थी वो --बस एक कीमती समान

उसका बचपना मासूमियत सब गुम होती गई

वो चुप सी हो गई --आँखों में सूनापन भर गया

बाबा आते मिलने सीने से लगा कर प्यार करते

खूब रोती ---क्यूं भेजा इनके घर ले चलो वापस

कैसे बताती वो --क्या बताती ----

दो व्याघ्र जैसी आँखे हरपल उसके इर्दगिर्द घूमती रहती हैं

मौका मिलते ही दो पंजे उसे दबोचने को तैयार रहते हैं

कैसे बताती अपने जनक से ---उनकी वैदेही अपने ही घर में

असुरक्षित है अपनों से ही ---डरती है ---नींद में चौक जाती है --

नींद खुल जाती है किसी लिजलिजे से स्पर्श से

और एक साया तेजी से बाहर जाता दिखता है

वो साया जिसे वो पहचानती है --- बोल नहीं सकती

कौन सुनेगा उसकी यहाँ --वो भी नहीं

जिसने रक्षा के वचन भरे थे ----किंकर्तव्यविमूढ हो गई

कैसे बताती वो --बाबा तुमने कैसा वर ढूंढा --

जो प्यार नहीं पैसा पहचानता है -----

जो सब जान कर अनजान बना रहता है

----क्या बोले वैदेही ---यहाँ औरतों का बोलना मना है

क्या बताये ये विवाह एक समझौता है ---

बाबा तुम्हारे रुतबे से -----मौन रही वैदेही बरसों तक

लेकिन कब तक ---सब कहते सब पूछते

बोलो वैदेही कुछ तो बोलो मौन क्यूं कब तक ?

--बाबा की गीली आँखे पूछती चुप क्यूं हो वैदेही ? -----चुक गया धैर्य

चीख पड़ी ---फूट फूट कर रोई बाबा के सीने से लग

नहीं अब और नहीं ---इस बार नहीं दोहराई जायेगी प्रथा

और वैदेही नें ---रघुवीर का परित्याग कर दिया ---

शायेद यही नियति है ---हर युग में ---

बार बार यही गूंजता है मन में --

और कितने जनम लोगी वैदेही ----
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दूर कहीं कोई रामायण की चौपाई उच्चार रहा था

अनुज बधू भगनी सुत नारी

ये सब कन्या सम है चारी

इन्हें कुदृष्टि बिलोके जोई

---आगे की पंक्तियाँ

घंटे घड़ियाल में गुम होती गई -----

------------Divya Shukla ------

पेंटिग अज्ञात कलाकार की ---