Friday, 30 May 2014

चलो मातम मनाये इस मर्दवाद पर --

चलो मातम मनाये इस मर्दवाद पर

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भीड़ का कोलाहल भयभीत औरत हां सब औरतें ही है

पहले नन्ही बच्चियां थी अब कहाँ रह गई सब बदल गई

औरतों के जिस्म में / वह जिस्म जो उनका मंदिर है पर

अब कहाँ वह तो एक कूड़ेदान हो गया टटोलते है जिसे गीदड

अपनी आदिम भूख मिटाने को ---सिर्फ औरत का जिस्म ही है

जो गोश्त के ढेर में बदल गया यहाँ चारों ओर पैने दांतों वाले आदमखोर घूम रहे

बघनखे पहने तलाशते है गर्म गोश्त / लहू पीते है नरम गर्दनो में दांत गड़ा के

सुनो रेशम सी बेटियों ओढ़ लो अपना खोल छुपा लो अपना वजूद

कोई हक नहीं खिलखिलाने तुम्हे झरनों की तरह बहने का /

समेट लो अपने पंख उतर आओ अपने आकाश से यह मुक्त गगन नहीं रहा तुम्हारा

यहाँ गिद्ध उड़ रहे है / दबोच लेंगे अपने मजबूत पंजो में नोच खायेंगे तुम्हारा जिस्म

तुम तो खूंटे की गईया थी रहोगी भी जहाँ हांक दिया वही जाना है दूसरे खूंटे में बधने

नहीं देखना सपने / झुठला दो सब बंद कर लो आँखे तुम को अब अपने को बचाना है /

पत्तल सकोरे कुल्ल्हड़ ही तो हो तुम जिसमे खाया और फेंक दिया /साबित किया

वह पुरुष है / चलो हम सब मिल मातम मनाएं मनुष्य की अंतरात्मा की मृत्यु पर

और छोभ व्यक्त करे मर्दवाद के जिंदा होने पर

-----------------दिव्या शुक्ला -----------

31-5-2014

चित्र गूगल से साभार