Monday, 23 June 2014

आग सा दहकता है ये मुजस्सिम: --

आग सा दहकता है ये मुजस्सिम:
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सोने सा बदन चांदी की नज़र --

फुल वाल्यूम में तुम्हारी आवाज़ गूंज रही - और मै 

उफ़ पक गए कान सर भारी हो गया सुनते सुनते

अब तो खीझ होने लगी है रफ़ी के इन बोलों से

तुम नहीं जानते कैसे ये एक आम सी लड़की जो

रोज रोज सूरज से धूप चुराती और बदन पर मलती

शायेद उसका बदन भी सुनहरा हो जाए ---

और इसी से चकाचौंध हो जायें तुम्हारी आवारा निगाहें

अटक कर रह जायें बस यही तक -- तुम्हारी थी फिर भी

कैसी मासूम सी ख्वाहिश कितनी बेवकूफी भरी कोशिश थी तुम्हे बाँधने की

तुम तो हर आंचल से टकराते आवारा झोंके हो

भूल ही गई थी भला कैसे रुक सकते थे एक ही आंचल में

आहिस्ता आहिस्ता तब्दील हो गई पूरी तरह से

पत्थर की हवेली में घूमते सोने की जीती जागती प्रतिमा में

लकदक करती सुनहरी धूल और जरी के कफन में लिपटी

पर दो बोलती आँखे उनकी नमी सूख गई पथरा गई जानते हो

एक नरम खरगोश सा नाज़ुक दिल कछुए की पीठ सा कठोर हुआ पता ही न चला

सुनो तुम क्या जानो तुम्हे पाने की चाहत में कितना कुछ खोया

पर जब भी तुम्हारे वक्ष पर सर रखा बड़ा कोलाहल था वहां

अचानक एक झटके लौट आई वो --नहीं यह मेरी जगह नहीं -

नहीं कभी नहीं यह तो मुसाफिर खाना है और मुझे अपना घर चाहिए सिर्फ अपना

टूट गया भरम और बिखर गया तिनके सा ख्याली घरौंदा ---

चुनी एक नई राह जिसका कोई भी सिरा तुम तक नहीं पहुँचता

अब कैसे जीना है धूप से नहाना है -या टूटे नारियल के कटोरे में चांदनी पीनी है

यह तो अब मुझे ही करना है किसी और के लिये नहीं बस अपने लिए

जानते हो अब यह मुजस्सिम: तुम्हारी राह नहीं देखता

धूप में चमकता है भटकता है जानते हो अब यह तपता भी है --

अब चौंधिया जायेंगी तुम्हारी आँखे पर हाथ जल जायेंगे

क्यूँ की अब आग सा दहकता है यह मुजस्सिम :

----------दिव्या शुक्ला ------

मुजस्सिम: -- प्रतिमा -मूर्ति

24-6-2014

पेंटिग  गूगल  से  साभार