Sunday, 29 June 2014

जाओ तुम भी ना

जाओ तुम भी ना

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थाम कर मेरी हथेली

न जाने किस रौ में उस शाम

अनगिनत शब्द उकेरे थे तुमने

न जाने कितनी बार

लिखा तर्जनी के पोरों से

अपना ही नाम -

मानो मेरी भाग्यरेखाओं से

खुद को बांध रहे हो --

खिलखिला कर हंस रही थी मै

गोल गोल बड़ी बड़ी आँखों से घूरा

तुमने खीझ कर मुझे -और मै ?

मै तो उस पल मौन हो गई मुस्कान दबा कर

आज न क्यूँ फिर याद आये वो पल

देर तक देखती रही अपने दोनों हाथो को

वो अक्षर ढूंढ रही थी -वो यही थे अभी तक

पसीजी हुई हथेलियों से अपना ही मुख ढांप लिया

सुनो देखो तो सारे शब्द उभर आये - मेरे चेहरे पर

अरे तुम कहाँ हो - कहाँ खो गए हो --

क्या कहीं और उकेर रहे हो यही शब्द -

उफ़ तुमसे ये उम्मीद न थी

--------- दिव्या शुक्ला ---------

30 -6-2014

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