Tuesday, 19 August 2014

पीड़ा-से आद्र अनुभूति !!

पीड़ा-से आद्र अनुभूति
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एकांत के अंधेरों में 

पीड़ाओं के विलाप 

पलकों से पसीजे 

भोर में भैरवी की धुन


पर थिरक गई अधरों

पर मुस्कान --

विडम्बनाओं के

झूले में धूप छाँव सा

झूलता मन

मंद गति से

खिसकता जीवन

जब अपनी ही परछाईं

को पकड़ने का निरर्थक

प्रयास में लगा रहता

तब झाँक जाता है

अट्टहास में छुपा विलाप

-----दिव्या शुक्ला !!

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