Friday, 1 August 2014

सुनो सुधर जाओ अब तो हमें शर्मिंदा न करो !!

सुनो सुधर जाओ अब तो  हमें शर्मिंदा न करो

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इन दोनों मन बहुत विचलित रहा

एक अजीब सी उदासी घेरे हैं

नींद मानो बैर ठाने है

आखिर थक कर पलकें झपक जाती है

फिर वही ख्वाब जो बार बार दीखता है

कोई मेरे हाथों से कलम छीनता है

और कहता है मै तेरी किस्मत लिखूंगा

मै मुकद्दर का फ़रिश्ता हूँ --

उसके सामने से कागज़ की पोथी छीन

चीख उठी मै नहीं अब नहीं -

तेरा लिखा बहुत भुगता मैने

अब खुद अपनी तकदीर मै ही लिखूंगी

और झटके से नींद टूट जाती है -----

हम औरतें मिटटी की तो बनी होती हैं

वो गीली गुंधी मिटटी जो हर रूप में ढल जाती है

हमारे ही बदन की मिटटी से बनते है

कुछ नन्हे खिलौने कुछ नन्हे फ़रिश्ते

जिनमे से कुछ बड़े हो कर -----

हमारी ही इस्मत से खेलते हैं

मिटटी में मिला देते है हमारी मोहब्बत भरी परवरिश

पर नहीं अब नहीं हमने ही बिगाड़ा है तुमको

कैसे मर्द बने तुम एक दुसरे से झगड़ते भी हो तो क्रोध में

अपशब्दों में अपनी ही माँ बहनों को याद करते हो

सुनो अब भी समय है सुधर जाओ वरना कहीं ऐसा न हो

बेटों की माँ कहलाने में हम शर्मिंदा हों !!

-----------दिव्या शुक्ला ----------

चित्र  गूगल  से  साभार