Monday, 22 September 2014

माँ अब नहीं पहचानती मुझे -



माँ अब नहीं पहचानती मुझे

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माँ की चिट्ठी में अक्षर धुंधले हैं

वो कागज़ भी पीला पड गया है

माँ के चेहरे की तरह ,मेरी चिंता में

दो बूंद आंसुओ के निशान भी हैं

पर वो अभी भी नम है --

सुनो माँ तुम नहीं जानती

अब मै भी थक गई हूँ -

तुम्हारी गोद में सर रख कर सोना है मुझे

बहुत दिनों से गहरी नींद नहीं आई

तुम कब आओगी क्यों नहीं पहचानती मुझे

डाक्टर कहता है अल्जाइमर है -कुछ नहीं है तुम्हे

अभी पिछले ही हफ्ते तो की बात है इधर मै जाग रही थी

दो सौ किलोमीटर दूर तुम घबरा कर जाग गई -

ये कैसा महीन तार जुड़ा है माँ बेटी के बीच शायेद -

गर्भनाल महीन तंतु से जुड़ी है अभी भी कटी नहीं पूरी तरह

नहीं सोई कितनी ही रातों से मै जानती हो माँ

तुम जब आओगी तुम्हारे पास तुम्हारा हाथ थाम कर

मुझे सोना है गहरी नींद तुम्हारे कमज़ोर जिस्म से लिपट कर -

बाँध लेना है अपने पल्लू से तुम्हारा आंचल

तब तुम मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जा पाओगी

--------दिव्या शुक्ला !!

22-9-2014

चित्र गूगल से साभार