Sunday, 12 October 2014

हरसिंगार के ये उजले फूल



हरसिंगार के ये उजले फूल

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भोर में हर रोज़ ही ये केसरी डंडी वाले

छोटे छोटे उजले हरसिंगार के फूल

ओस से नहा कर हरी दूब के कालीन पर

जब अपनी भीनी भीनी सुगंध लिए

टप टप गिर कर बिछते हैं

लेट कर न जाने कितनी देर --

मै उन्हें अंजुरी में रोपती रहती हूँ

हरसिंगार धीमे धीमे बरसता रहता है

ओढ़ना चाहता है मानो मुझे

श्वेत धवल महकती चादर

सुनो ! जानते हो तुम ?

इन्हें छू कर क्या चाह सी उठती है मन में

काश एक हरसिंगार तुम रोप दो मेरे मन में भी

जिसके फूल मेरी इन आँखों से झरें

और तुम अंजुरी में रोप लो उन्हें --
-----दिव्या शुक्ला -!!