Tuesday, 9 December 2014

अब कोई अहल्या पाषाण नहीं बनेगी



अब कोई  अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

--------------------------------------
पत्थर तो हूँ पर अहल्या  नहीं

फिर राम तुम भी तो नहीं

नहीं चाहिये तुम्हारा स्पर्श

इस पत्थर में स्पंदन भरने को

अगर असंभव को संभव कर सको

इस पाषाण ह्रदय पर  अंकित करो

कुछ कोमल अभिव्यक्तियाँ

पर नहीं कहाँ कर सकोगे

पुरुषोचित अहम तुम्हारा दम्भ

बार बार रोकेगा तुम्हे

तुम या तो छलना जानते हो

किसी अहल्या  को छदम रूप धर

और उसी को सांत्वना नहीं

पाषाण बना देते हो अपने व्यंग बाणों से

पति के रूप में ---धिक् है तुम पर

अपने अहंकार के वशीभूत हो

अरे तुम उस इंद्र को दंड दे सकते थे

जिसने सतीत्व भंग किया छल से

छली गई नारी तो स्वयं आहत है

नहीं बदला अभी भी कुछ

आज छल बल दोनों है --

इंद्र का प्रतीक कामांध पुरुष

एवं गौतम ऋषि के प्रतीक पति

पर नहीं है तो वो अहल्या  जो

उस युग में पाषाण बनी पड़ी रही

युगों तक मार्ग में अविचल

सिर्फ एक स्पर्श के लिए

किसी इंद्र के प्रतीक में नहीं है

अब इतना साहस छल सके

न ही किसी के छुद्र अहंकार में

इतनी शक्ति वो तिरस्कृत करे

यह शरीर मंदिर है नारी का

और मंदिर परम पवित्र होता है

इसमें वास करने वाली आत्मा

शक्ति और आत्मविश्वास से पूर्ण होती है

अब कोई अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

तुम्हे बदलना होगा अब ----

इस कलयुग के इंद्र --और गौतम

--------दिव्या शुक्ला  !!

पेंटिग गूगल से साभार