Thursday, 27 March 2014

ये भूमिजायें

ये भूमिजायें

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वर्जनाओं की लकीरों को पार कर

एक दूसरे का सहज संबल बन

पाषण के परकोटों से मुक्त हो

सधे क़दमों से सीढी उतरती

अपना अस्तित्व तलाशने

निकल ही पड़ी

ये भूमिजायें
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---------दिव्या !!

पेंटिग गूगल से साभार

Friday, 21 March 2014

सहमी हुई सांकलें !!

सहमी हुई सांकलें
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न कितने भारी कदमो की पदचाप

गूंज रही रात्री के नीरव एकांत में !

सहमा सा सन्नाटा फैला चारों ओर

जीरो पावर के बल्ब की पीली रोशनी

भरसक कोशिश कर रही अंधेरो से लड़ने की !

और मै ? पूरी खुली थी मेरी आँखे झपकी तक नहीं

नींद न जाने कहाँ आवारागर्दी कर रही थी !

परंतु मै निद्रावस्था थी या तंद्रा में पता नहीं

सुन पा रही थी आहटें दिख रहे थे काले लबादे !

बूझने की कोशिश करती पर असफल कौन हैं ये --

खिड़की के ठीक नीचे बैठा एक आवारा श्वान

अपने पंजो से खोदा था जिसने एक गड्ढा !

अपनी ही रात्री का ठिकाना --उफ़ कितनी भयानक आवाज़

अचानक जोर से रो उठा वह सिहरन सी दौड गई शरीर में !

क्या उसने भी सुनी वह आवाजे या दिख गए वो स्याह वजूद

अरे ये भागते हुए कदम मेरे घर की तरफ बढ़ने लगे --

उफ़ मै अपने ही शव को अपने ही काँधे पर लाद कर

भाग रही हूँ भागती जा रही हूँ मेरे पैरों का रक्त निचुड़ गया

उनमे मानो पत्थर बंधे हों /मृत्यु से भय नहीं फिर क्यों भाग रही हूँ

अचानक एक चीख से आँख खुल जाती है /किसकी थी वो चीख

/शायेद कोसों दूर मेरी माँ की वो भी जाग गई थी

हां हां यह उसी की पुकार थी मेरा नाम लेकर चीख उठी

और उसकी आवाज़ यहाँ तक गूंज उठी /पीछे हट गए सारे साये

अवचेतन से चेतन में वापस लौट आई मै और फिर --

स्वयम को टटोला जीवन का स्पंदन सीने में बहुत तीव्रगति से हो रहा था

और पूरा शरीर पसीने से भीग उठा था / भारी कदमो से दरवाजे की ओर बढ़ी

दोनों द्वार भयाक्रान्त हो एक दूसरे को जकड़े थे ---

और लटकी थी एक सहमी हुई सांकल ---

--------Divya Shukla -----------

21-3-2014

पेंटिग गूगल से साभार 

Friday, 7 March 2014

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है !

अभी तो अपने अस्तित्व का अहसास किया है 
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अभी से इतना कोलाहल क्यूं मचा है ?
अरे मै औरत हूँ बस यही तो कहा मैने 
अपनी बेड़ियों को अभी तो धीरे धीरे उतारना शुरू किया है 
कुछ कुछ अपने अस्तित्व का भी अहसास किया है

अभी तक तो अनजान थी मै ----या यूँ कहो अनजान बनी रही
मै तो तुम्हारे घर के ड्राइंगरूम का शोपीस ही तो बनी रही
या पलंग की रेशमी चादर ----सहभागिनी थी पर
हर अंतिम निर्णय तो सिर्फ तुम्हारा होता था न क्यूं ? बोलो
स्पष्ट बोलना गुनाह है बेहयाई है सिर्फ मेरे लिये
तुम तो कुछ भी कर सकते हो कह सकते हो ----------
और मै सोच भी नहीं सकती ---------
मैने प्रेम भी किया तुम से ही -----------
तुम्हारे लिये जीती रही तुम में ही जीती रही
संतान को कब जन्म देना है ये निर्णय भी तुम्हारा ही होता
क्यूं की मै तो साधन हूँ न अब तक --बस एक उर्वरा भूमि
पर अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
बस तुम्हें इतना ही तो स्वीकारना है मै वस्तु नहीं भोग्या नहीं
हम दोनों का अस्तित्व बराबर है ----पूरक है हम एक दूसरे के
नहीं बनना मुझे देवी -----मुझे अपना आसमान चाहिये
अपनी उड़ान ---अपनी सोच ----अपना अस्तित्व -------
डरो मत फिर भी मै तुम्हारी ही रहूंगी
एक नई और आत्मविश्वास से भरी हुई --
अपनी मौलिक सोच के साथ तुम्हें और भी अच्छी लगूंगी
ज़रा सोच कर देखो ---वो समय कितना सुंदर होगा
जब हम दोनों अपने अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ जियेंगे
हम ईमानदार होंगे एक दूसरे से --------------------
तुममे भी धैर्य होगा --मेरी स्वतंत्र सोच को समझने का
मुझमे आत्मविश्वास होगा अपने सारे फैसले लेने का
-----------दिव्या शुक्ला --------------

पेंटिग गूगल से साभार --

8.3.2014