Tuesday, 19 August 2014

पीड़ा-से आद्र अनुभूति !!

पीड़ा-से आद्र अनुभूति
---------------------

एकांत के अंधेरों में 

पीड़ाओं के विलाप 

पलकों से पसीजे 

भोर में भैरवी की धुन


पर थिरक गई अधरों

पर मुस्कान --

विडम्बनाओं के

झूले में धूप छाँव सा

झूलता मन

मंद गति से

खिसकता जीवन

जब अपनी ही परछाईं

को पकड़ने का निरर्थक

प्रयास में लगा रहता

तब झाँक जाता है

अट्टहास में छुपा विलाप

-----दिव्या शुक्ला !!

पेंटिग गूगल से 

Thursday, 14 August 2014

देवियाँ बोला नहीं करती --

देवियाँ बोला नहीं करती --

--------------------------

जब भी स्त्री जीवन की

काली अँधेरी राहों से

बाहर आना चाहती है

नई राह खोजती है

रोशनी की नन्ही किरण के लिये

बस --हंगामा हो जाता है

देवी को महिमामंडित

सिंहासन से उतार फेंकते हैं

पवित्र ---अपवित्र ---दो शब्द

बेध कर रख देते ---

स्त्री के हर्दय को

यही दो शब्द थे ---जिसने

अहिल्या को पत्थर बनाया

क्यूं नहीं समझते ----

--हमारी मर्यादा हमारा सम्मान

हमारे अपने लिये है -------

--विवाह स्वर्ग में बना जन्मो का बंधन नहीं

मन का बंधन हैं ---प्रेम का बंधन हैं ---

नहीं स्वीकार है वस्तु बनाना -----

- -धुर्वस्वामिनी धन्य है

कायर पति द्वारा शकराज को उपहार में

दिये जाने का प्रतिकार --------

प्रतिकूल परस्तिथियों में सहनशक्ति की पराकाष्ठा

अंत मे एक चीत्कार -----एक प्रश्न -----

--आखिर ये निर्णय होना ही चाहिये -----

मै कौन हूं --क्या एक वस्तु ?? ----

--कायर पति का परित्याग --

--विवाहित जीवन की मर्यादा का कठोरतम पालन

स्वतंत्र होने के पश्चात चन्द्रगुप्त का वरण ---

क्या प्रसाद की धुर्वस्वामिनी आदर्श नारी नहीं

अगर है तो उसका उदाहरण क्यूं नहीं ?

काश कि हर धुर्वस्वामिनी को चंद्रगुप्त मिले -----

माना की मौन सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो सकता है

पर वह स्वतंत्र सक्षम मौन ---

----लाचार असमर्थ दयनीय मौन नहीं ----

तुम्हें पता नहीं ऐसा मौन जब टूटता है

संबंध दरक जाते है ---नीवें हिल जाती है

इसीलिए तो कहा न ---हमें सुनो समझो

हमारा मन तो पढ़ो ----खुल कर जीने दो

हमारी इच्छा अनिच्छा का भी मतलब समझो

जिसे प्रेम करते है उसे जी भर याद तो कर सके

काल्पनिक जगत में विचरने में भी पाबंदी

कलम चली अगर हमारी ---तो कितनी भृकुटियां टेड़ी

आखिर क्यूं ---मत करो ऐसा --समझो सोचो --

अभी तो अस्तित्व को बचाने को जूझ रही है नारी

ये समय है कोख में समाप्त होता अस्तित्व बचाने का

आने वाला समय व्यक्तित्व का ---

अस्तित्व --व्यक्तित्व ---और हम --

आने वाला समय हमारा ही होगा

---------दिव्या शुक्ला ----

पेंटिग गूगल से

Friday, 1 August 2014

सुनो सुधर जाओ अब तो हमें शर्मिंदा न करो !!

सुनो सुधर जाओ अब तो  हमें शर्मिंदा न करो

-----------------------------------------

इन दोनों मन बहुत विचलित रहा

एक अजीब सी उदासी घेरे हैं

नींद मानो बैर ठाने है

आखिर थक कर पलकें झपक जाती है

फिर वही ख्वाब जो बार बार दीखता है

कोई मेरे हाथों से कलम छीनता है

और कहता है मै तेरी किस्मत लिखूंगा

मै मुकद्दर का फ़रिश्ता हूँ --

उसके सामने से कागज़ की पोथी छीन

चीख उठी मै नहीं अब नहीं -

तेरा लिखा बहुत भुगता मैने

अब खुद अपनी तकदीर मै ही लिखूंगी

और झटके से नींद टूट जाती है -----

हम औरतें मिटटी की तो बनी होती हैं

वो गीली गुंधी मिटटी जो हर रूप में ढल जाती है

हमारे ही बदन की मिटटी से बनते है

कुछ नन्हे खिलौने कुछ नन्हे फ़रिश्ते

जिनमे से कुछ बड़े हो कर -----

हमारी ही इस्मत से खेलते हैं

मिटटी में मिला देते है हमारी मोहब्बत भरी परवरिश

पर नहीं अब नहीं हमने ही बिगाड़ा है तुमको

कैसे मर्द बने तुम एक दुसरे से झगड़ते भी हो तो क्रोध में

अपशब्दों में अपनी ही माँ बहनों को याद करते हो

सुनो अब भी समय है सुधर जाओ वरना कहीं ऐसा न हो

बेटों की माँ कहलाने में हम शर्मिंदा हों !!

-----------दिव्या शुक्ला ----------

चित्र  गूगल  से  साभार