Monday, 22 September 2014

माँ अब नहीं पहचानती मुझे -



माँ अब नहीं पहचानती मुझे

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माँ की चिट्ठी में अक्षर धुंधले हैं

वो कागज़ भी पीला पड गया है

माँ के चेहरे की तरह ,मेरी चिंता में

दो बूंद आंसुओ के निशान भी हैं

पर वो अभी भी नम है --

सुनो माँ तुम नहीं जानती

अब मै भी थक गई हूँ -

तुम्हारी गोद में सर रख कर सोना है मुझे

बहुत दिनों से गहरी नींद नहीं आई

तुम कब आओगी क्यों नहीं पहचानती मुझे

डाक्टर कहता है अल्जाइमर है -कुछ नहीं है तुम्हे

अभी पिछले ही हफ्ते तो की बात है इधर मै जाग रही थी

दो सौ किलोमीटर दूर तुम घबरा कर जाग गई -

ये कैसा महीन तार जुड़ा है माँ बेटी के बीच शायेद -

गर्भनाल महीन तंतु से जुड़ी है अभी भी कटी नहीं पूरी तरह

नहीं सोई कितनी ही रातों से मै जानती हो माँ

तुम जब आओगी तुम्हारे पास तुम्हारा हाथ थाम कर

मुझे सोना है गहरी नींद तुम्हारे कमज़ोर जिस्म से लिपट कर -

बाँध लेना है अपने पल्लू से तुम्हारा आंचल

तब तुम मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जा पाओगी

--------दिव्या शुक्ला !!

22-9-2014

चित्र गूगल से साभार

Monday, 15 September 2014

आखिर स्त्री का अपना घर कौन सा है ?



आखिर स्त्री का अपना घर कौन सा है ?
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न जाने क्यूं -----
बार बार ये प्रश्न गूंजता है मन में ----
स्त्री का अपना घर कौन सा है ???
मायका या ससुराल ????
सोचो आज अगर पिता से
लड़की अपना घर मांग ले तो ?
उसका मायका छूट जायेगा न
खून के रिश्ते अगर बेरहम नहीं होंगे ----
फिर भी खटास तो आ ही जायेगी ----
किसी स्त्री का अपना घर कहाँ होता है ----
पिता का घर ----पति का घर ---बेटे का घर --
परजीवी हुई न -----और क्या नाम दूँ ---
हँसी आती है कभी कभी यह सोच कर
स्त्री की न कोई जाति है न धर्म
वो सब पुरुष का दिया -------------
कहीं देवी बना दिया कहीं दासी
कहीं कुलीन परिवार के ऐश्वर्य में
मिस्र की ममी की भांति सज्जित हो
उनके गुण दोष छुपा कर घुट घुट कर मरती है
तो कोई दासी बन कर खटती है -----
आध्यात्म या आत्महत्या -------
दोनों ही एक सहज साधन है
इन से मुक्ति का और कोई रास्ता नहीं
अगर ये रास्ता नहीं अपनाया फिर --------
तो यही से शुरू होता है उसका संघर्ष --------
सच ही तो कहा मैने ----------------------
स्त्री परिवार की इज्जत कहलाती है
पर परिवार पुरुष का ही कहलाता है
कर्तव्य तो है उसके पर अधिकार नहीं
बहुत से ऐसे पति पत्नी भी होते है
प्रेम नहीं है आपस में पर -----
रिश्ते निभाने है ----------
पर बिना प्रेम के रिश्ते क्या होते है
मुझे समझ में नहीं आता
इनको क्या कहते है ----------------
कोई बता सकता है क्या ??--------
मुझे तो लगता है मन का सब खेल है
मन मिला तो मेला -----
वरना सब से भला अकेला ----
अगर प्रेम भी नहीं तो क्या रह गया फिर ----
माना तुम आसमान हो ------------------
तो हम भी जमीन है --------------
दोनों ही एक दूसरे के बगैर अधूरे ---------
फिर तुम्हारा अहम क्यों आड़े आता है ------
अगर सीमा रेखायें स्वार्थ और अधिकार के लिये खींची हो -------
तो उनके पार क्या जाना पाप है ?
-------दिव्या शुक्ला ----