Monday, 15 December 2014

जानते हो न मीता -



जानते हो न मीता
--------------------------------------

तुम जानते तो हो ही न मीता तुम्हे क्या बताना

---------जाड़े की गुनगुनी दोपहर चहकती गुनगुनाती हैं

तो शामे एक गहरी उदासी से भरने लगती है --------

------------रात गहराती है और अवसाद से भर जाती है

सिमट जाती है अपने ही खोल में --याद आने लगता है ------

सब कुछ तुम्हारे साथ गुज़रा वो वक्त --जो कहा वो भी और जो न कहा वो भी

ऐसी ही ठंड में बोरसी की आग में लकड़ियाँ जला कर तापना

आलू और शकरकंद गर्म राख में दबा -उसे उलटना पलटना उफ़

और हरी धनिया मिर्च वाले नमक के साथ मूंगफली खाना --

अरे हाँ तुम्हारी नानस्टाप बकबक भी तो सुनना -अरे ठीक है मेरी बकबक सही

सुनो मीता मैने कितनी बार तुमसे कहा हम कितने भी अच्छे दोस्त हो

पर ये दुनिया इतनी अच्छी नहीं जो हमारा मन पढ़ सके ----

कच्चे सूत के धागे से बंधा है हमारा मन हमारा रिश्ता हमारी दोस्ती

तुम कितनी ही दूर रहो इसी धागे से जुड़े हो ---अच्छा एक बात कहूँ

मुझे अपने घर में नौकरी दे दो न --क्या कहा मुझे काम करना नहीं आता

अरे हंस क्यों रहे हो .....मजाक उड़ा रहे हो मेरा

जाओ नहीं बोलती मै तुमसे .....अच्छा हुआ तुम मेरे पल्ले नहीं पड़े

तुम से तो कभी नहीं बनती मेरी ......हद्द हो गई अब तो ---लेकिन क्या करूँ

अब मै तुम्हारे बगैर रह भी तो नहीं पाती ...तुम भी तो नहीं रह पाते

एक बात बताओ क्यूँ नहीं साथ रह सकते हम --क्या दो दोस्त साथ नहीं रह सकते

अब तो सांझ हो चली है जीवन की -- साँझ के धुधलके में ही तो सहारा चाहिए न ?

तुम मेरे पास नहीं हो जानती हूँ कभी होगे भी नहीं यह भी जानती हूँ

पर सोच तो सकती हूँ ----पता नहीं कौन सी भूल हुई हम दोनों से

अच्छा एक बात बताओ मीता कहीं हिरामन की तरह तुम भी डरते तो नहीं

बिगड़ते काहे हो अरे महुआ घटवारिन से होगी कोई तुम्हारी भी --

कही तुमने भी तो ये तीसरी कसम तो नहीं खाई -(अब भूल जाऊंगा तुम्हे )

अर्ररर नहीं कहूँगी न तंग करुँगी तुम्हे ,लेकिन पहले वचन दो मुझे उस उपरवाले से

जरुर झगड़ेंगे दोनों मिल कर --- जीवन के पथ पर मीत क्यों मिलाये

और मिलाये तो दूर क्यों कर दिया ---

--------दिव्या शुक्ला !!

Tuesday, 9 December 2014

अब कोई अहल्या पाषाण नहीं बनेगी



अब कोई  अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

--------------------------------------
पत्थर तो हूँ पर अहल्या  नहीं

फिर राम तुम भी तो नहीं

नहीं चाहिये तुम्हारा स्पर्श

इस पत्थर में स्पंदन भरने को

अगर असंभव को संभव कर सको

इस पाषाण ह्रदय पर  अंकित करो

कुछ कोमल अभिव्यक्तियाँ

पर नहीं कहाँ कर सकोगे

पुरुषोचित अहम तुम्हारा दम्भ

बार बार रोकेगा तुम्हे

तुम या तो छलना जानते हो

किसी अहल्या  को छदम रूप धर

और उसी को सांत्वना नहीं

पाषाण बना देते हो अपने व्यंग बाणों से

पति के रूप में ---धिक् है तुम पर

अपने अहंकार के वशीभूत हो

अरे तुम उस इंद्र को दंड दे सकते थे

जिसने सतीत्व भंग किया छल से

छली गई नारी तो स्वयं आहत है

नहीं बदला अभी भी कुछ

आज छल बल दोनों है --

इंद्र का प्रतीक कामांध पुरुष

एवं गौतम ऋषि के प्रतीक पति

पर नहीं है तो वो अहल्या  जो

उस युग में पाषाण बनी पड़ी रही

युगों तक मार्ग में अविचल

सिर्फ एक स्पर्श के लिए

किसी इंद्र के प्रतीक में नहीं है

अब इतना साहस छल सके

न ही किसी के छुद्र अहंकार में

इतनी शक्ति वो तिरस्कृत करे

यह शरीर मंदिर है नारी का

और मंदिर परम पवित्र होता है

इसमें वास करने वाली आत्मा

शक्ति और आत्मविश्वास से पूर्ण होती है

अब कोई अहल्या  पाषाण नहीं बनेगी

तुम्हे बदलना होगा अब ----

इस कलयुग के इंद्र --और गौतम

--------दिव्या शुक्ला  !!

पेंटिग गूगल से साभार