Saturday, 14 February 2015

चलो न मीता ,,,


चलो न मीता ,,,
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तुम कितने खराब हो गए हो मीता कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ
और तुम न भुलाय बैठे हो हम को ऐसा पत्थर का करेजा न था तुम्हारा
कितनी बार समझाया काहे करते हो इतनी मेहनत जब हम साथ न बैठ पायें 
तुम कहे थे न हमको इस बार माघ मेला जरुर ले जाओगे ,,,और याद है का कहे थे
अपनी बैल गाडी में ले कर बस हम और तुम ,,, ऐ सुनो न तुम तो जानते हो
हमको बैलगाड़ी में तुम्हारे साथ दूर की यात्रा करने की कितनी साध है
एक लालटेन टंगी हो बैलों के गले में घंटी टुनटुनाती हो
तुम हो और हम हों बस और कोई नहीं हमारी परछाईं भी नहीं ,,,,तुम पूरे स्वर में गाओ
वही गीत जो तुम हमारे लिए अक्सर गुनगुनाते हो ,,,,सच्ची मीता और कुछ ना चाहिए
ठंड बहुत है पाला पड़ रहा है तुम कहाँ हो ,,,अभी वो महुआ घटवारिन की कहानी भी तुमने पूरी नहीं सुनाई ,,जानते हो मुझे मेला नहीं घूमना मुझे तो तुम्हारे साथ बस यात्रा करनी है वो भी बैलगाड़ी में ,,जब तुम नहीं होते हो हिरामन तो मै तुम्हारी सारी शिकायत इस मिट्ठू से करती हूँ ,,अब हंस क्यूँ रहे हो जाओ नहीं बोलती तुमसे ,,,,तुम बहुत खराब हो ,,,,,,
अब तुम मेरे मीता हो न ,,,और मै ? मै तो बावली हूँ तुम्हारी तस्वीर से बातें करती हूँ ,,,,अरे हाँ याद आया इस बार मेले में हम दोनों तस्वीर भी खिंचवायेंगे ,,,दिन रात सफर करेंगे रस्ते में नदी के घाट पर रुकेंगे ,,,,लकड़ी जला कर साथ बैठेगे मै रोटी बनाउंगी उसी आग में और आलू भी भूनेगे ,,,,तुम बार बार कहोगे बस रात बीतते बीतते पहुँच जायेंगे और मै मन ही मन देवी देवता मनाउंगी रास्ता कभी न ख़तम हो ,,,,, कुछ ज्यादा तो चाह नहीं की हमने बस तुम्हारे संग साथ रुकते चलते जिंदगी चलती कट जाए ,,,न ये रस्ते ख़त्म हों न तुम्हारे किस्से कहानियां ,,,
-----दिव्या शुक्ला !!!

बस यूँ ही जो कुछ कुछ