Friday, 27 February 2015

उफ़ -- अब तो हद्द हो गई



उफ़ -- अब तो हद्द हो गई
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-सुनो --सुन रहे हो ना
मेरी जिंदगी बिस्तर से गीले तौलिये उठाते /
तो कभी स्लीपर्स का दूसरा जोड़ा खोजते गुजरती जा रही है 
बाथरूम में टूथपेस्ट का ढक्कन खुला / मोइश्च्राइज़र की बोटल लुढकी
पर हाँ कोलोन और परफ्यूम हमेशा अपना कैप पहने रहते
हाँ भई प्रिय है तुम्हे /देखो बस बहुत हो गया अपने जूते तो अंदर न लाओ
बारिश के कीचड़ से भरे हैं आज कितना पानी बरसा /उफ़ कितने लापरवाह हो तुम
सारा कारपेट गंदा कर दिया और मोज़े देखो इन्हें बाथरूम में डालना वरना देखना फिर ...अब यही आदतें तुम्हारे बेटे भी खुदबखुद सीखते जा रहे हैं / पर तुम्हे क्या तुम्हे कहाँ फुरसत है
सब देखने की / तुम से कोई बात कहती हूँ तो सारी बात ख़तम होने के बात पूछते हो तुम ने कुछ कहा --- इतनी देर बकबक करती रही और तुम पूछ रहे हो कुछ कहा क्या
रोज़ सुबह पेपर ले कर टायलेट जाना कौन सी अच्छी आदत है और तो और सीट के बगल मैगज़ीन होल्डर लगवाना याद रहा पर मेरे लिए मोगरे के गजरे लाना तो भूल ही गये अब /हाँ क्यों याद रहेगा वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था /अब तो टायलेट में ही वर्ड पालिटिक्स डिसकस होती है ओबामा के साथ / जितना वक्त मुझसे दूर गुज़रे कम है / पर मिसेज़ जैन को gudmorning कहना न भूलना /सुनो मेरा comparison तो करना मत किसी से मुझे अच्छा नहीं लगता समझे ---एक मै ही जो तुमसे निभा रही हूँ दूसरी होती तो कब की छोड़ के चली गई होती -----
सबसे बुरी कौन सी आदत है तुम्हारी जानते हो नहीं ? खाना तो सिर्फ मेरे हाथ का बना शौक से खाओगे पर तारीफ़ के एक बोल भी नहीं फूटेंगे मुंह से /
कल से खाना तो क्या काफी भी नहीं बना कर दूंगी समझे -- -सोचती हूँ कभी तुम्हे अगर तलाक़ दूंगी तो इसकी यही वज़ह काफी होगी / बिस्तर पर गीला तौलिया फेंकना / मेरा फोन इग्नोर करना / सोफे पर सो जाना /और हाँ रात को बिना ब्रश किये सोना /और हाँ तुम्हारा बाथरूम में पेपर पढना उफ़ कितना - / पैरों के नाख़ून खुद तो काटना ही नहीं मै काटूँ तो बडबडाना
मुस्कराओ मत जी जल जाता है मेरा / सच कह रही हूँ चली जाउंगी छोड़ कर ----
---ख़ैर इतना कुछ काफी है अब भी तुम्हे छोड़ने के लिए
----दिव्या शुक्ला !!
दुनिया भर की सारी पत्नियों के दिल का दर्द --सच कहा न