Wednesday, 10 June 2015

नदी मर रही हैं



नदी  मर  रही  हैं
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नदी का चौड़ा पाट सिमट गया

बलुहे कगारों के बीच बह रही है

सहमी सी कृशकाय नदी

दूर दूर तक कोई वृक्ष नहीं

असमय हत्या कर दी गई उनकी

हत्यारे निर्द्वन्द घूम रहे है

नदी दबी कुचली डरी हुई

बस बह रही है जी रही है

मेरा मन रो रहा है

रोकते रोकते भी टपक गए

दो बून्द अश्रु जिन्हें नदी ने

अपनी दो सीपियों में छुपा लिया

 मैं सिसकियों को चुपके से

दबा आई किनारे पड़े पुराने

पत्थरों की महीन दरारों में

मरती हुई नदी को शायेद

जीवन की ओर मोड़ सके

सीपियाँ और सिसकियाँ
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------दिव्या शुक्ला !!