Sunday, 1 March 2015

कुछ तुम करना कुछ मै !!

कुछ तुम करना कुछ मै
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कल अलसुबह आना
मै मुट्ठी भर सपने लाऊंगी
तुम उन्हें कांच सा तोड़ देना 
बचे खुचे विश्वास को रेत में बिखेर देना
आंचल में भरी चांदनी पर रात उड़ेल देना
मै रात को सूरज में लपेट दूंगी
तुम दिन को सियाह कर देना
मै नीम की फुनगी पर चाँद टांग दूंगी
पत्तियों से छन के आती मध्यम रोशनी में
कुछ जोड़े घटाएंगे --ये भी तुम ही करना
मुझे जीवन का गणित नहीं आता
मन का बोझ उतार फेकना -----
रात आते ही तुम जहाँ चाहो चले जाना --
बिना कोई बोझ लिए अपने ज़मीर पे
मै आवाज़ नहीं दूंगी न अभी--- न ही फिर कभी
जाते जाते मेरा भरोसा मेरा विश्वास
मुझे लौटा जाना जो तुम्हे सौंपा था
--तुम बाकी जिंदगी आराम से सोचना
क्या खो दिया क्या पाया ---और मै
-मेरी बात छोडो----तुम नहीं समझोगे
ख़ैर छोडो जाओ भी अब --
मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की --

----दिव्या शुक्ला !!

पेंटिग गूगल से साभार