Thursday, 30 April 2015

लक्ष्मण रेखा



लक्ष्मण रेखा
--------------------
मै चाह के भी वो लक्ष्मण रेखा नहीं मिटा पाती
जो न जाने क्यूँ मैने सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए खींच दी थी
नहीं नहीं कोई अविश्वास नहीं , भला तुमसे क्या छुपा है 
हां कभी खोने का अनजाना सा भय तो कभी तुम्हे भींच लेने की चाह
कितना अजीब है ये अंतरविरोध ---
सुनो तुम नहीं जानते ---
मै अक्सर नींद से चिहुंक कर उठ जाती हूँ --
पसीने से लथपथ मेरे हाथ अँधेरे में टटोलते है तुम्हे --
मेरी धौकनी सी चलती साँसे स्थिर होना चाहती हैं
तुम्हारी पीठ से लिपट कर ,लेकिन तुम तो यहाँ कभी थे ही नहीं ,
पर अभी अभी थे न मेरे पास बहुत पास ,,तुम यहीं थे -
गुनगुना रहे थे मेरे कानों में अपना प्रिय गीत --
मेरी उँगलियाँ तुम्हारे वक्ष के घने बालों में उलझी थी --
लिख रही थी मै वो सब कुछ जो कभी कह नहीं पाती तुमसे ,,,,
और तुम ,,, तुम न वो सब आँखें मूंद कर पढ़ रहे थे मुस्करा रहे थे ,,
छलक रहा था तुम्हारी आँखों से नेह और मै भीग रही थी
मेरा एक हाथ जोर से थाम रखा था तुमने जैसे कहीं भाग न जाऊं मै ,,,
सुनो मन्त्रविद्ध अब कहाँ जाउंगी बंध गई हूँ
ये हवा भी तुम्हारी मुट्ठी में कैद हो गई ,,,,,
तुम तो जानते ही हो हवा दिखती नहीं
बस महसूस की जाती है ,,,मेरी तरह
न जाने और कितनी बातें थी जो पहली बार कह रही थी मै तुमसे
,,,, बस तभी न जाने कैसे कौन हमारे बीच आ जाता है
उफ़ ये काली पारदर्शी आकृति और मै चीख कर उठ जाती हूँ ,,,
तुम नहीं हो अब यहाँ ,,, और है केवल घना अँधेरा ,,,
जानी पहचानी सी आदिम गंध तुम्हारी ,तुम्हारा अहसास
ओह देखो न --मेरी कलाई पर कैसे उपट आये
तुम्हारी तीन उंगलियों के निशान --
और मेरी ही खिंची हुई लक्ष्मण रेखा --
--------- दिव्या शुक्ला !!
पेंटिंग  गूगल से साभार